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Thursday, January 20, 2011

मनमोहनजी, मत भूलिए कि आप प्रधानमंत्री हैं

मनमोहनजी ने कहा मुझे मार्च में कीमतों में स्थिरता दिखाई दे रही है पर मैं ज्योतिषी नहीं हूँ. क्लिक करें.

यह सारा देश जानता है कि मनमोहनजी ज्योतिषी नहीं हैं, पर सारा देश यह भी जानता है कि वह इस देश के प्रधानमंत्री हैं और यह उनका कर्तव्य है कि वह आम आदमी की सुख-सुविधा और सुरक्षा का ख्याल रखें. क्या यह मान लिया जाए कि मनमोहनजी स्वयं यह बात भूल गए हैं कि वह इस देश के प्रधानमंत्री हैं और इस देश में उनकी सरकार चल रही है? कीमतें आसमान छू रही हैं, आम आदमी की जिंदगी नर्क बन गई है, पर प्रधानमंत्रीजी इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें कर रहे हैं. उन्हें मार्च में कीमतों में केवल स्थिरता दिखाई दे रही है, कीमतें कम होती नजर नहीं आ रहीं. कीमतें कम कौन करेगा? वह स्वयं, जो प्रधानमंत्री हैं, या उनके वित्त मंत्री, या उनके कृषि मंत्री, कोई तो होगा उनकी सरकार में जिसकी जिम्मेदारी कीमतें कम करना है. या फिर मनमोहनजी इसे अपनी सरकार की जिम्मेदारी ही नहीं मानते.

अगर वह स्वयं को और अपनी सरकार को कीमतें कम कर पाने में असमर्थ मानते हैं तब क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वह अपने पद से हट जाएँ. शायद कोई और हो जो कीमतें कम कर सके? शायद कोई और हो जो उनकी तरह गठबंधन के अधर्म को अपना धर्म न मानता हो? शायद कोई और हो जो किसी व्यक्ति के प्रति बफादार न होकर इस देश की जनता के प्रति बफादार हो?

जब पानी काफी देर तक एक पात्र में पड़ा रहता है, उसकी गति थम जाती है, उसका वहाब शून्य हो जाता है, तब वह पानी सड़ जाता है, उसमें हानिकारक कीड़े पैदा हो जाते हैं, ऐसे पानी को बदल देना चाहिए. अगर न बदला गया तब देश को अनेकानेक बीमारियाँ जकड लेती हैं, नागरिकों का जीवन खतरे में पड़ जाता है. क्या मनमोहनजी ऐसा चाहते हैं?

Friday, October 16, 2009

President's Secretriat Helpline - No real help to consumer

There are many helplines to help aam aadmi, but poor aam aadmi never gets any help. When President's Secretariat started a helpline I registered a grievance on 28th July 2009 about RTI Act. Whenever I checked the status, it said that a letter/e-mail will be sent to me separately. The letter/e-mail never arrived. I registered a reminder grievance on 06th October 2009. Today I checked the status. It says my grievance is under examination.

On 29th July 2009, I registered another grievance about pathetic condition of DDA District Park in Paschim Puri. As per the status shown on helpline website, my petition was transferred on 18th August 2009 to Shri Rakesh Mohan, Principal Secretary (AR), Delhi Sectt. I did not hear anything from PS (AR). I sent an e-mail to PS (AR) which was not replied. I phoned his office and was told that Shri Rakesh Mohan is not PS (AR). With being directed from one phone number to another, I finally got in touch with a Section Officer where I was informed that President's Sectt has wrongly transferred the petition to Delhi Sectt as DDA is not under Delhi Govt. He gave me address of some website where these details are posted, but that website never opened. I returned to President's Secretariat Helpline. There is a link - Click here to view the live status of this case. I have clicked on it on different days but it never opens. Frustrated I registered a reminder grievance on 06th October 2009. Today I checked the status. It says my grievance is under examination.

It is no use. Poor aam aadmi can not do any thing. They only shout to help aam aadmi, but aam aadmi never gets any help.

Wednesday, October 07, 2009

सरकारी हेल्पलाईन - आम आदमी को बेबकूफ बनाने का यंत्र

दिल्ली की मुख्यमंत्री, शीला दीक्षित, ने पिछले तीन चुनाव जीत कर अगर कुछ सीखा है तो वह है आम आदमी को किस तरह बेबकूफ बनाया जाय. सच कहा जाय तो आम आदमी को बबकूफ़ बना कर ही उन्होंने यह चुनाव जीते हैं. भारतीय राजनीति भी अजीब है, इसमें आम आदमी को जो पार्टी सबसे ज्यादा बेबकूफ बना दे वह जीत जाती है. इसमें शीला जी ने जो महारथ हासिल कर ली है वह किसी भी प्रकार से मायावती से कम नहीं है. यह दोनों महिलायें महान हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती जी, और दिल्ली में शीला जी. मायवती जी अपनी मूर्तियाँ बनबाती हैं. शीला जी रोज सरकारी विज्ञापनों में अपनी फोटो छपवाती हैं. दोनों अपने-अपने तरीकों से आम आदमी को खूब बेबकूफ बनाती हैं.

आम आदमी को बेबकूफ बनाने के अपने अभियान में शीला जी ने कल एक और अध्याय जोड़ा जब दिल्ली में एक और हेल्पलाइन शुरू की गई. इस हेल्पलाइन को मुख्य मंत्री के 'कान और आँख' का नाम दिया गया है. यानी कि अब मुख्य मंत्री आम आदमी के कान और आँख से देखेंगी. इस का मतलब यह नहीं है कि मुख्य मंत्री के कान और आँख ठीक से काम नहीं कर रहे. वह ठीक ठाक काम कर रहे हैं, पर सारा समय वह इन्हें अपनी और अपनी पार्टी की स्वार्थसिद्धि के लिए प्रयोग करती हैं. आम आदमी के लिए अब वह आम आदमी के कान और आँख प्रयोग करेंगी. 'अपने हाथ मुझे दे दे ठाकुर' गब्बर ने कहा था. 'अपने कान और आँख मुझे दे दे आम आदमी' शीला जी ने कहा.

सब कुछ समझते हुए मैं भी बेबकूफ बन गया. कल मैंने काफी समय नष्ट किया मुख्य मंत्री के कान और आँख बनने के लिए पर जब भी फोन मिलाया यही आवाज आई - लाइन व्यस्त है, कुछ देर बाद फोन करें. हार कर सो गया. आज सुबह अखवार में पढ़ा कि ७० आम आदमी बेबकूफ बनने में कामयाब हो गए. ज्यादा आम आदमियों को जो बेबकूफी की वह नगर निगम द्बारा बेबकूफ बनाने से सम्बंधित थीं. अब इसका इस्तेमाल करेंगी शीला जी, नगर निगम पर अपना अधिकार हासिल करने के लिए. आम आदमी तो परेशान है और परेशान रहेगा. देखा फिर बना दिया न शीला जी ने आम आदमी को बेबकूफ. हो सकता है कामनवेल्थ खेलों के बाद सोनिया जी उन्हें भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित भी कर दें. आखिरकार शीला जी उनके लिए भी तो आम आदमी को बेबकूफ बनाने का काम कर रही हैं.

आप धन्य हैं शीला जी. मुझे भी बेबकूफ बना दिया. सब को समझाता हूँ पर खुद बेबकूफ बन गया. लगा रहा घंटों फोन पर. यही तो महानता है शीला जी आपकी. फिल्म निकाह में एक गाना था - शायद उनका आखिरी हो यह सितम (बेबकूफ बन्नाना), हर सितम यह सोच कर हम सह गए (बेबकूफ बन गए).