भारतीय प्रजातंत्र में नागरिकों को बहुत सारे अधिकार हैं. शिकायत करने का अधिकार उन में से एक महत्वपूर्ण अधिकार है. लोग शिकायत करते हैं, और जब कोई उनकी शिकायत नहीं सुनता तब वह इस न सुनने की शिकायत करते हैं. शिकायत न सुनने वालों का कहना है कि उन्हें भी शिकायत न सुनने का अधिकार है. अब यह तो अधिकार-अधिकार की लड़ाई है. जिसका अधिकार तगड़ा निकला वह जीत गया. 'तगड़े' से मेरा मतलब है कि अगर आपने शिकायत न सुनने वाले को यह विश्वास दिला दिया कि आपकी शिकायत न सुनने से उसे नुकसान हो सकता है, तब वह तुरंत आपकी शिकायत सुनेगा. बल्कि न सिर्फ़ सुनेगा, बल्कि तेजी से उसे ठीक भी करेगा. अब यह विश्वास आप कई तरीकों से दिला सकते हैं. सबसे प्रभावशाली तरीका है, उसे किसी नेता से अपनी जान पहचान का हवाला देना.
आपका शिकायत करना जायज है. संविधान ने आपको शिकायत करने का पूरा अधिकार भी दिया है. पर आप दूसरों के उस अधिकार को नजरअंदाज नहीं कर सकते, जिस के अंतर्गत वह यह सब कर सकते हैं. यह अधिकार आता है उस सोच से जो कहता है - 'अरे यार यहाँ सब चलता है'. इस सोच के आगे संविधान भी हाथ खड़े कर देता है.
बहुत से संस्थान शिकायत सुन तो लेते हैं, पर कुछ करते नहीं. कुछ बड़े सेवा संस्थान शिकायत को शिकायत न मानकर सुझाव के रूप में दर्ज कर लेते हैं और बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारे यहाँ कोई शिकायत नहीं आती. कुछ और बड़े सेवा संस्थान शिकायतों से निपटने के लिए कम्पूटर लगा देते हैं. आप शिकायत करते हैं और यह कम्पूटर उसे एक नंबर दे देता है और कुछ समय बाद बंद कर देता है. कोई एक्शन न होने पर आप फ़िर शिकायत करते हैं या पहली शिकायत का रिमाइंडर देते हैं. यह कम्पूटर फ़िर एक नया नंबर दे देता है और कुछ समय बाद उसे बंद कर देता है. यह सिलसिला चलता रहता है और कुछ समय बाद आप थक कर शिकायत करना बंद कर देते हैं. कुछ संस्थान अपने और आपके बीच में काल सेंटर खड़ा कर देते हैं और मस्ती की नींद सोते हैं. आप निपटते रहिये काल सेंटर वालों से. पुलिस की बात करें तो वह शिकायत दर्ज करने से बचने में एक्सपर्ट हैं. अक्सर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के लिए अदालत में जाना पड़ता है.
आम तौर पर जनता को सरकार से शिकायत होती है. पर अब सरकार भी जनता की शिकायत करती है. पिछले दिनों दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली के कुछ लोगों की शिकायत की थी. हल्ला मच गया तो शिकायत को सुझाव कह दिया गया. नेता लोग तो हमेशा ही दूसरे नेताओं और पार्टियों की शिकायत करते रहते हैं. इन शिकायतों का कोई अर्थ नहीं होता, बस वह राजधर्म का पालन करने के लिए की जाती हैं.
दूसरी तरफ़ कुछ लोग आपके सुझाव को शिकायत मान लेते हैं और बुरा मान जाते हैं. अगर आपने कुछ ज्यादा सुझाव दे दिए तो आप के बारे में यह कहा जाने लगता है कि, 'यार यह आदमी हर समय शिकायत ही करता रहता है'. आप लाख कहें कि मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ पर कोई आपकी बात नहीं सुनता.
सबसे मजेदार बात यह है की लोग सिर्फ़ दूसरों की शिकायत करते हैं. ख़ुद की शिकायत कोई नहीं करता. अगर आप ईमानदारी से किसी मसले को देखें तो पाएंगे कि उसमें शिकायत तो आपके ख़ुद के ख़िलाफ़ बनती है. क्या आपने कभी अपने ख़िलाफ़ शिकायत की है? यदि नहीं तो करके देखिये. कुछ नया ही अनुभव मिलेगा.
एक कहावत है - "शिकायत करो और भाड़ में जाओ". क्या कहा, आपने नहीं सुनी आज तक यह कहावत? अरे भाई सुनेंगे कहाँ से. अभी अभी तो लिखी है मैंने. बैसे एक बात बताइये, क्या आप ख़ुद नहीं कहते हें, शिकायत करो और भाड़ में जाओ?
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Tuesday, May 13, 2008
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