
कुछ समय पहले मैंने अपने ब्लॉग काव्य कुञ्ज पर एक पोस्ट लिखी थी - मीठा-मीठा मैं, कड़वा-कड़वा तू. इस पोस्ट में मैंने लिखा था कि दिल्ली में जो कुछ अच्छा होता है उस का श्रेय शीला दीक्षित ले लेती हैं. अखवारों में शीला जी की तस्वीर के साथ एक विज्ञापन छप जाता है. जो बुरा होता है उस की जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी जाती है. कभी नगर निगम तो कभी बाहर आकर दिल्ली में बसे लोग और कभी दिल्ली वालों पर.
अखवार में ऐसे विज्ञापन जनता के पैसे का निजी स्वार्थों का दुरूपुओग करके छापे जाते हैं. आज जिस खबर की फोटो मैंने यहाँ छापी है उस के अनुसार लोकायुक्त ने जनता के पैसे का इस तरह दुरूपयोग करने के लिए एक नोटिस जारी किया है. आप को अखवारों में शीला जी के बारे में जो अच्छी खबरे मिलेंगी उन सब में शीला जी की फोटो जरूर होती है, पर इस खबर में शीला जी की फोटो नहीं है. है न मजेदार बात. अगर जनता और नेता के बीच में किसी को चुनना हो तो ज्यादातर अखवार वाले नेता को चुनते हैं. इसे क्या कहेंगे, मजेदार बात या जनता के साथ विश्वासघात?
जनता का पैसा केंद्र सरकार भी खूब उडाती है इस तरह के विज्ञापनों में. खूब जम कर विज्ञापन छपते हैं मंत्रियों और उनकी मालकिन की फोटो के साथ. मेरे विचार में ऐसा ही एक नोटिस प्रधान मंत्री और मंत्रियों को भी भेजा जाना चाहिए.