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Wednesday, May 28, 2008

मैंने लालू जी को पत्र लिखा

श्री लालू प्रसाद
केन्द्रीय रेल मंत्री, भारत सरकार
रेल भवन, नई दिल्ली

मंत्री महोदय,

भारत के एक वरिष्ठ नागरिक का आप को नमस्कार. कुछ दिनों पहले मुझे आपकी रेल में सफर करने का मौका मिला. मैं दिल्ली में रहता हूँ और मुझे उड़ीसा में झरसुगुडा जाना था. शाम को वायुयान से दिल्ली से कोलकाता पहुँचा. हावड़ा से मुझे हावड़ा - अहमदाबाद एक्सप्रेस (२८३४) से झरसुगुडा जाना था. एअरपोर्ट से मैं हावड़ा स्टेशन पहुँच गया. मुझे लगभग तीन घंटे स्टेशन पर बिताने थे क्योंकि यह ट्रेन रात ११५५ पर हावड़ा से छूटती है.

प्लेटफार्म पर बहुत भीड़ थी और बैठने का कोई इंतजाम नहीं था. मैं ऊपर प्रतीक्षालय में पहुँचा,पर वहाँ की स्थिति तो प्लेटफार्म से भी ख़राब थी. गरमी बहुत थी. कुर्सियों की संख्या यात्रियों की संख्या से बहुत कम थी. पंखों की संख्या भी कम थी और जिस तरह उन्हें लगाया गया था उनसे हवा नहीं मिल पा रही थी. शौचालय गंदे और बदबू से भरे हुए थे. फर्श पर पानी भरा हुआ था. मैंने जब एक सहयात्री से इस बारे में बात की तो उसने कहा, 'यह भारतीय रेल में सफर करने की सजा है'. यकीन कीजिये मंत्री जी, अगर किसी सजायाफ्ता मुजरिम को इस प्रतीक्षालय में बंद कर दिया जाय तो वह अपराध करना छोड़ देगा.

जब मुझसे गरमी और बदबू बर्दाश्त नहीं हुई तो मैं नीचे प्लेटफार्म पर आ गया. वहाँ भी बहुत गरमी थी. बैठने के लिए सीट नहीं थीं. यात्री जमीन पर बैठे हुए थे. यह प्लेटफार्म अभी नया बनाया गया है, पर न जाने क्यों बैठने की उचित व्यवस्था नहीं की गई है. ट्रेन के जाने का समय हो गया पर ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं लगाई गई. लगभग ४० मिनट बाद ट्रेन प्लेटफार्म पर आई. चलते चलते काफ़ी लेट हो गई ट्रेन. झरसुगुडा यह ट्रेन लगभग तीन घंटे लेट पहुँची. जिस मीटिंग के लिए मैं झरसुगुडा गया था वह दो घंटे देर से शुरू हो पाई. मंत्री जी हावड़ा स्टेशन पर जो तकलीफ हुई वह तो मैंने बर्दाश्त की, पर मेरी वजह से कार्यक्रम देर से शुरू हो पाया इस के लिए मुझे ३० व्यक्तियों के सामने शर्मिंदा होना पड़ा.

अब वापसी की बात करें. झरसुगुडा से हावड़ा मुझे आज़ाद हिंद एक्सप्रेस (२१२९) से आना था. यह ट्रेन लगभग दो घंटे देर से आई. रास्ते में और ढाई घंटा लेट हुई. हावड़ा इस ट्रेन ने ०३५५ पर पहुँचना था, पर ०८३० पर पहुँची. कोलकाता से मेरी टिकट ०८२० की फ्लाईट में थी. फ्लाईट मिस हो गई. ११३५ की फ्लाईट से नया टिकट खरीदना पड़ा. दिल्ली में अपने घर चार घंटे लेट पहुँचा.

यह बहुत ही निराशाजनक है कि आपकी रेलों में समय की पाबन्दी पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. आपने जितने रेल बजट पेश किए हैं उन में कभी समय की पाबंदी की बात नहीं की गई. जब मंत्री जी ही को समय की पाबन्दी की कोई चिंता नहीं है तो रेल अधिकारी इस बारे में क्यों चिंतित होंगे? यह भारतीय रेल के लिए शर्म की बात है.

अब बात करें पैसे की जो मुझे खरचना पड़ा. मुझे हावड़ा से झरसुगुडा जाना था पर तत्काल सेवा में मुझे टिकट अहमदाबाद तक खरीदना पड़ा. झरसुगुडा तक ८७६ रुपए लगते हैं पर मुझे अहमदाबाद तक के टिकट पर २२८० रुपए खर्च करने पड़े. वापसी में यही हुआ. झरसुगुडा की जगह मुझे अहमदाबाद से टिकट खरीदना पड़ा. कार्यकर्म चूँकि लेट शुरू हुआ था इसलिए समाप्त होने में देर हुई और यह टिकट बेकार गया. चूँकि यह टिकट अहमदाबाद से था इस लिए झरसुगुडा में केंसिल नहीं हो पाया. एक नया टिकट खरीदना पड़ा. पर इस बार टिकट झरसुगुडा की जगह राजनांद गाँव से दिया गया. यह टिकट १२२८ रुपए में आया. कुल मिला कर मुझे १७५२ रुपए की जगह ५७८८ रुपए खर्च करने पड़े.

ट्रेन के हावड़ा लेट पहुँचने से मुझे और ज्यादा नुकसान हुआ. जो रिजर्व टिकट था उस का तो पैसा गया ही, नए टिकट पर ४४२४ रुपए और खर्च करने पड़े. इस प्रकार आपकी रेल में सफर करने से मुझे शारीरिक और मानसिक परेशानी तो हुई ही, उस साथ आर्थिक नुकसान भी हुआ ८६४० रुपए का. काफ़ी मंहगा बैठा यह भारतीय रेल का सफर.

यह सब क्या है? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. एक व्यक्ति के एक सफर में रेल ने ४२१६ रुपए ज्यादा कमाए. लाखों लोग आपकी रेल से सफर करते हैं. कुछ न कुछ हर यात्री से ज्यादा कमाया ही जाता होगा. इसे क्या कहा जाए, ईमानदारी की कमाई या बेईमानी की? आप कहेंगे की यह तो हमारे नियम हैं. यही तो बेईमानी है. भारत मैं आप की ही एक रेल है. वह सरकारी भी है. अब इस का ग़लत फायदा उठाया जाय और जैसे चाहे नियम बना दिया जाएं. यह तो बेईमानी ही कहलायेगी.

मंत्री जी आप को शायद मेरी बात अच्छी न लगे पर यह जो दिखाया जा रहा है कि आपने रेल को नुकसान से फायदे में ला दिया है, इसी तरह के नियम बना कर और यात्रियों से ग़लत पैसे बसूल कर किया जा रहा है. दिखाने को किराए में कुछ कमी कर दी गई है पर हकीकत में इन यात्री विरोधी नियमों से ज्यादा पैसा बसूला जा रहा है.

रेल एक सरकारी महकमा है. उस का मुख्य उद्देश्य यात्रियों को एक सुविधाजनक, समयबद्ध, साफ-सुथरी, सुरक्षित, सस्ती सेवा उपलब्ध कराना होना चाहिए, न कि केवल पैसा कमाना. सरकारी रेल को 'न फायदा, न नुकसान' के सिद्धांत पर चलना चाहिए. फायदा दिखा कर वाह वाही लूटने के लिए इन सभी यात्री सुवुधाओं को दर किनार कर देना बहुत ही बुरी बात है. कृपया इस बात पर गौर कीजिये.

मैं चाहूँगा कि आप इस पत्र को एक शिकायत के रूप में भी लें, और मेरा जो ज्यादा पैसा खर्च हुआ है उसे वापिस करवाने की व्यवस्था करें. टिकट मेरे पास सुरक्षित हैं. आप जब कहेंगे, उन की प्रतिलिपि मैं आप को भिजवा दूँगा.

साभार,

एस. सी. गुप्ता