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Monday, May 12, 2008

लालूजी की रेलों में सफाई प्रतियोगता

मैं अक्सर रेल में सफर करता हूँ. आप भी करते होंगे. आपने भी देखी होगी, प्लेटफार्म पर सफाई, दो प्लेटफार्म के बीच रेल लाइनों पर सफाई, प्रतीकक्षालयों में सफाई, शौचालयों में सफाई, चलती रेलों में सफाई. हर जगह आपको गंदगी ही गंदगी दिखाई देगी. एक गन्दा सोच बन गया है रेल प्रशासन में. ऐसा नहीं है कि सफाई करने के लिए सुविधाएँ नहीं हैं. सुविधाएँ हैं पर क्यों परेशान होना. यात्री शिकायत करते नहीं. बल्कि वह ख़ुद भी गंदगी करने में अपना पूरा योगदान देते हैं. पिछले सप्ताह मैंने आज़ाद हिंद एक्सप्रेस में सफर किया. एक एसी २ टियर और तीन एसी ३ टियर, यह चार डिब्बे साथ थे. मैं शौचालय की तरफ़ गया. मेरे डिब्बे के शौचालय बहुत गंदे थे. इसलिए दूसरे डिब्बों में गया. सब जगह ऐसी या इस से बुरी हालत थी. एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक जाने पर तो ऐसा लगा जैसे किसी कूड़ेदान से गुजर रहे हों. फर्श पर पानी, चाय के पेपर कप, पानी की खाली बोतलें, रात में खाने की पेपर की थालिआं, और न जाने क्या क्या.

आपको शायद याद हो, कुछ वर्ष पहले लालूजी ने बजट भाषण के दौरान प्लेटफार्मों पर सफाई प्रतियोगता का एलान किया था. जो प्लेटफोर्म साफ पाए जाएँगे उन्हें पुरूस्कार मिलेगा. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. अगले वर्षं के बजटों में इस का कोई जिक्र भी नहीं किया उन्होंने. शायद बजट भाषण के बाद उन्होंने सफाई प्रतियोगता को गंदगी प्रतियोगता के रूप में बदल दिया. शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेंस में नए डिब्बे लगे हैं, पर शौचालय गंदे रहते हैं. तरल साबुन की जगह सादा पानी भर दिया जाता है. पूरी यात्रा के दौरान कोई सफाई कर्मचारी नजर नहीं आता.

लालूजी बातें बहुत करते हैं. उनकी तारीफ़ भी बहुत की जाती है कि उन्होंने रेल का कायाकल्प कर दिया है. पर में जब भी सफर करता हूँ मुझे सामान्य सफाई भी नजर नहीं आती. गंदे डिब्बे, गंदे शौचालय, गंदे प्लेटफार्म, रेल लाइनों पर गंदगी, यह लालूजी का रेल ब्रांड है.