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Sunday, September 12, 2010

रेल सेवाएँ और ग्राहक


भारत का लगभग हर नागरिक रेल में यात्रा करता है और इस नाते रेल सेवाओं का ग्राहक है. इस सेवा में कोई स्पर्धा नहीं है. ले देकर एक ही रेल सेवा है और उसे सरकार चलाती है. एक सही गुणवत्ता की रेल सेवा प्रदान करने के दावे तो बहुत कुछ किये जाते हैं पर यह सब दावे खोखले हैं. इस का कारण है, सरकार/मंत्री स्तर पर जबाबदेही का न होना. इस स्तर पर एक गैरजिम्मेदारी का माहौल है, जिसका का प्रभाव निचले स्तरों पर पड़ा है और पूरे रेल ढाँचे में गैरजिम्मेदारी का माहौल नजर आता है.

रेल के अन्दर खाने की सेवाओं की अगर बात की जाय तब ऐसा ही माहौल नजर आता है. यह सेवाएँ इंडियन रेलवे केटरिंग एवं टूरिज्म कारपोरेशन (आईआरसीटीसी) प्रदान करता है. भारतीय रेल की प्रतिष्ठित राजधानी एवं शताब्दी एक्सप्रेस के मीनू कार्ड पर नजर डालिए (फोटो पर क्लिक करें). अब हकीकत में क्या होता है इसकी जानकारी मैं आपको देता हूँ. यह बता दूं कि मैं शताब्दी एक्सप्रेस से नियमित यात्रा करता हूँ. आईआरसीटीसी जो खाद्य सामग्री ग्राहकों को उपलब्ध कराता है उस के पैसे पहले ही ले लिए जाते हैं. यह सेवा प्रदान करने के लिए आईआरसीटीसी टेंडरों के माध्यम से केटरिंग एजेंसिओं को ठेका देता है.

खाद्य पदार्थ रेल डिब्बे में जहाँ रखे जाते हैं वहां की सफाई को उच्च स्तर का नहीं कहा जा सकता. पानी गर्म करने के लिए जो उपकरण इस्तेमाल किये जाते हैं उन की साफ़-सफाई का कोई प्रबंध नजर नहीं आता. गर्म पानी सर्व करने के फ्लास्क और कप को देख कर चाय/काफी पीने का मन नहीं करता. लगभग ७८ यात्रियों को सर्व करने के लिए केवल दो वेटर हैं, फ्लास्क की संख्या बहुत कम है. इसके कारण डिब्बे के दूसरे हिस्से में बैठे यात्रियों को सेवा देर से मिलती है. डिब्बे के पास के हिस्से में बैठे यात्री जब चाय/काफी पी लेते हैं तब उन फ्लास्कों में दूसरे यात्रियों को सर्व किया जाता है. प्लास्टिक ट्रे टेढ़ी हो गई हैं. रेल के झटकों में चाय इत्यादि कपड़ों पर गिरने का डर रहता है. कभी-कभी पेपर कप चाय पीने के लिए दिए जाते हैं, यह गर्म हो जाते हैं और चाय पीने में काफी दिक्कत होती है.

नई दिल्ली - कालका शताब्दी में मैंने ९ सितम्बर को यात्रा की. मैं डिब्बे के दूसरे हिस्से में था. पानी की बोतल रेल चलने के २० मिनट बाद मिली. अखवार ४० मिनट बाद मिला और वह भी जो बच गया. सुबह की चाय में चाय का एक बेग और दूध का एक पेकेट कम मिला (मीनू कार्ड के अनुसार इनकी संख्या २ होनी चाहिए थी पर मिला एक). नाश्ते के साथ चाय में भी यही हाल था. यह सिर्फ मेरे साथ नहीं था. पास में बैठे और यात्रियों के साथ भी यही हुआ. लगभग १२०० यात्री शताब्दी में यात्रा करते हैं. अंदाजा लगाइए, २४०० टी बेग और २४०० दूध के पेकेट कम सर्व करके ठेकेदार ने कितने पैसे बचाए. ११ सितम्बर को मैं वापस आया. यही हाल शाम की चाय में हुआ. खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता आईआरसीटीसी कैसे सुनिश्नित करता है, यह जानने के लिए मैंने आरटीआई में अर्जी दी पर कोई जानकारी अभी तक नहीं मिली है. पुनः एक और अर्जी देने जा रहा हूँ.

रेलों में चाय कैसे बनती है यह देखने के लिए क्लिक करें.

मैं अगर यह कहूं कि रेल में खान-पान से सम्बंधित सेवाओं की गुणवत्ता सही नहीं है तो गलत नहीं होगा. भारत सरकार/रेल मंत्रालय/आईआरसीटीसी ग्राहकों के साथ अन्याय कर रहे हैं, उनकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं.

Saturday, October 10, 2009

भारतीय रेलों में मिलने वाली चाय कैसे बनती है?




काफी समय पहले मैंने इस ब्लाग पर एक पोस्ट लिखी थी - भारतीय रेलों में मिलने वाला खाना कितना सेफ है?. आज मुझे एक ई-मेल मिली जिसमें रेल यात्रियों को रेल में मिलने वाली चाय से सावधान किया गया है. आप भी पढें इस मेल को.

Think Before Drinking tea while travelling by indian Railway (IR)

1.Caterers use toilet water for making tea.
2.The tea is made in a special zone near toilet meant for Catering Service staff.
3.Bath heater with Scaling (white layer) is used for making tea.

These snaps were taken by a friend while travelling in kokan railway (Janshatabadi Exp.)

Next Time, don't say, "IF ONLY I KNEW BEFORE HAND!"

Sunday, July 06, 2008

लालू जी की रेल - अघोषित घोषणाऐं

लालू जी अक्सर घोषणाऐं करते हैं, बजट के दौरान, हार पहनने के वाद, फीते काटने के वाद. इस के अलावा स्टेशन पर भी बहुत सी घोषणाऐं होती हैं. पर कुछ घोषणाऐं ऐसी हैं जो कभी नहीं होतीं. यह घोषणाऐं ऐसी हैं जिनसे रेल के असली हालत पता चलते हैं. अब लालू जी तो यह घोषणाऐं करने वाले हैं नहीं, तो मैंने सोचा कि में ही क्यों न यह घोषणाऐं कर डालूँ.

"अगर आप किसी जरूरी काम से यात्रा कर रहे है और समय की भी पाबंदी है तब हमारी रेल से यात्रा न करें. अगर कोई रेल समय से पहुँच जाती है तब यह ईश्वर की इच्छा है. समय का हमारी रेल में कोई महत्त्व नहीं है. हम देरी के लिए खेद प्रकट करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते."

"अगर आपको सादा, स्वच्छ, स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना खाने की आदत है तब अपना खाना ख़ुद लायें. यात्रा के दौरान अगर आपने स्टशन या रेल में आईआरसीटीसी द्बारा सप्लाई किया गया खाना खाया और बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपको सुबह घूमने की आदत है और स्वच्छ हवा अपने फेफड़ों में भरने का नशा है तब स्टेशन पर बने प्रतीक्षालयों में न जाएँ. बहाँ के अशुद्ध वातावरण में अगर आप बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपकी रेल किसी स्टशन पर रुकी है तब खिड़की से बाहर न झांकें. साथ की पटरियों पर गन्दगी और कूड़ा-करकट देख कर अगर आपकी तबियत ख़राब हो गई तब इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"रेल का बहुत सा पैसा जुर्माने से बसूल होता है. इसलिए बिना टिकट या ग़लत टिकट के साथ यात्रा करें और जुर्माना भरें. ऐसा करके आप अपना राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा करेंगे रेल को फायदा होगा और हमारे मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"समय से टिकट खरीदना कोई अच्छी आदत नहीं है. तत्काल सेवा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. इस से आपकी जेब हलकी होगी, रेल की जेब भरेगी, मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"अगर आपको दिल्ली से आगरा जाना है और वापस आना है तब वापसी का टिकट दिल्ली में खरीदें. जाने का टिकट आगरा के किसी ट्रेवल एजेंट द्बारा खरीदें. इससे हर टिकट पर हमारी रेल को १५ रुपए ज्यादा मिलेंगे. रेल फायदे में जायेगी. मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे. ऐसा सब यात्राओं में करके अपनी राष्ट्रभक्ति का सबूत दें."

"रेल सेवाओं में कमी और गड़बड़ की शिकायत करना अच्छी आदत नहीं है. यह बिना मतलब की शिकायतें करके आप मंत्री जी और उनके सहयोगिओं को परेशान करते हैं. हमारी रेल में शिकायत सुनने और उस पर कार्यवाही करने का कोई प्रावधान नहीं है. शिकायत करके अपना और हमारा समय नष्ट न करें."

"रेल सुरक्षा बल आपकी सुरक्षा के लिए नहीं है. यह आपसे रेल को कोई नुक्सान न पहुंचे यह देखने के लिए है. अगर कोई सुरक्षा कर्मचारी आपकी वजह से परेशान हुआ तो आपके ख़िलाफ़ कार्यवाही की जायेगी."

"हमारी रेल में आप अपनी जिम्मेदारी पर सफर करते हैं. समान की चोरी, आपकी अपनी टूट-फूट और किसी भी नुकसान के लिए आप ख़ुद जिम्मेदार हैं. आप अपनी मर्जी से रेल में यात्रा करते. हम आपको यात्रा करने के लिए बुलाने नहीं जाते."

"हम अक्सर ऐसा कहते हैं - 'रेल आपकी संपत्ति है'. इसे सच न मान लें. रेल हमारे मंत्री जी और उनके परिवार, सम्बन्धियों, मित्रों और अन्य राजनेताओं की व्यक्तिगत संपत्ति है. आप उस में इस लिए सफर करते हैं कि रेल को फायदा हो. आपकी सुविधा के लिए हम रेल नहीं चलाते."

Monday, May 12, 2008

लालूजी की रेलों में सफाई प्रतियोगता

मैं अक्सर रेल में सफर करता हूँ. आप भी करते होंगे. आपने भी देखी होगी, प्लेटफार्म पर सफाई, दो प्लेटफार्म के बीच रेल लाइनों पर सफाई, प्रतीकक्षालयों में सफाई, शौचालयों में सफाई, चलती रेलों में सफाई. हर जगह आपको गंदगी ही गंदगी दिखाई देगी. एक गन्दा सोच बन गया है रेल प्रशासन में. ऐसा नहीं है कि सफाई करने के लिए सुविधाएँ नहीं हैं. सुविधाएँ हैं पर क्यों परेशान होना. यात्री शिकायत करते नहीं. बल्कि वह ख़ुद भी गंदगी करने में अपना पूरा योगदान देते हैं. पिछले सप्ताह मैंने आज़ाद हिंद एक्सप्रेस में सफर किया. एक एसी २ टियर और तीन एसी ३ टियर, यह चार डिब्बे साथ थे. मैं शौचालय की तरफ़ गया. मेरे डिब्बे के शौचालय बहुत गंदे थे. इसलिए दूसरे डिब्बों में गया. सब जगह ऐसी या इस से बुरी हालत थी. एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे तक जाने पर तो ऐसा लगा जैसे किसी कूड़ेदान से गुजर रहे हों. फर्श पर पानी, चाय के पेपर कप, पानी की खाली बोतलें, रात में खाने की पेपर की थालिआं, और न जाने क्या क्या.

आपको शायद याद हो, कुछ वर्ष पहले लालूजी ने बजट भाषण के दौरान प्लेटफार्मों पर सफाई प्रतियोगता का एलान किया था. जो प्लेटफोर्म साफ पाए जाएँगे उन्हें पुरूस्कार मिलेगा. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. अगले वर्षं के बजटों में इस का कोई जिक्र भी नहीं किया उन्होंने. शायद बजट भाषण के बाद उन्होंने सफाई प्रतियोगता को गंदगी प्रतियोगता के रूप में बदल दिया. शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेंस में नए डिब्बे लगे हैं, पर शौचालय गंदे रहते हैं. तरल साबुन की जगह सादा पानी भर दिया जाता है. पूरी यात्रा के दौरान कोई सफाई कर्मचारी नजर नहीं आता.

लालूजी बातें बहुत करते हैं. उनकी तारीफ़ भी बहुत की जाती है कि उन्होंने रेल का कायाकल्प कर दिया है. पर में जब भी सफर करता हूँ मुझे सामान्य सफाई भी नजर नहीं आती. गंदे डिब्बे, गंदे शौचालय, गंदे प्लेटफार्म, रेल लाइनों पर गंदगी, यह लालूजी का रेल ब्रांड है.

समय की पाबन्दी!! यह क्या चीज है?

बचपन में पढ़ा था - समय बहुत बलबान है, समय किसी के लिए नहीं रुकता, जो समय के साथ नहीं चलते पिछढ़ जाते हैं. जीवन के हर पड़ाव पर यह अनुभव भी होता गया. शिक्षा पूरी होने पर मैनेजमेंट से संबंधित व्यवसाय ही चुना. टाइम मैनेजमेंट एक मुख्य विषय रहा. पर भारत सरकार के रेल मंत्रालय की नजर में समय का कोई महत्त्व नहीं है. कितने बजटों की नौटंकी देखी है मैंने. किसी बजट में किसी रेल मंत्री ने समय की पाबन्दी की कोई बात नहीं की. रेल कब छूटती है और कब पहुँचती है यह बात कभी किसी मंत्री के ध्यान में ही नहीं रही. पिछले दिनों मैंने एक ब्लाग पोस्ट लिखी थी कि रेलों के लेट पहुँचने से कितने समय की बबादी होती है? अगर आप रेलों के देर से पहुँचने के कारण बरबाद हुए समय की गणना करें तो दंग रह जायेंगें. मेरे विचार में यह एक बहुत बड़ा अपराध है और इसके लिए रेल मंत्रालय की जितनी भर्त्सना की जाए कम होगी.

आज के अखबार में एक समाचार है - लालूजी सिंगापुर जाकर वहाँ के मैनेजमेंट स्टूडेंट्स को भारतीय रेल की महान सफलताओं के बारे में बतायेंगें. लेकिन रेलों के देर से चलने से देश को कितनी आर्थिक हानि हुई है इसका जिक्र वह नहीं करेंगे. जितना फायदा लालूजी दिखायेंगे वह उस नुकसान से बहुत कम होगा जो उन्होंने देश को पहुँचाया है. अगर हम उनसे इस बारे में बात करें तो मुझे विश्वास है कि उनका जवाब होगा - ""यदि आप समय पर अपने गंतव्य पर पहुँचना चाहते हैं तब भारतीय रेल से यात्रा न करें. समय की हमारे लिए कोई कीमत नहीं है".

पिछले सप्ताह मैं उड़ीसा में झरसागुडा गया था. दिल्ली से कोलकाता तक हवाई यात्रा और वहाँ से रेल. हावड़ा-अहमदाबाद एक्सप्रेस का छूटने का समय है ११.५५, पर यह ट्रेन १२.३० पर पलेटफ़ामॅ पर लगाई गई. गर्मी से बुरा हाल हो गया. आधा घंटा ट्रेन लेट चली और दो घंटा देर से पहुँची. जिस कार्य के लिए मैं गया था वह देर से शुरू हो पाया. इक्कीस लोग मेरे देर से पहुँचने से परेशान हुए. और इस सबके लिए कौन जिम्मेदार था, लालूजी और उनका मंत्रालय.

वापसी में मेरा रिज़र्वेशन आज़ाद हिंद एक्सप्रेस में था. यह ट्रेन लगभग दो घंटा बिलंब से आई. रास्ते में और बिलंब हुआ और यह ट्रेन ०८.३२ पर हावड़ा पहुँची. इसका सही समय है ०३५०. कोलकाता से मुझे ०८.२० की फ्लाईट लेनी थी पर वह मिस हो गई. टिकट बेकार गया. ११.३५ की फ्लाईट से नया टिकट लेना पड़ा. लालूजी के कारण मुझे ४५०० रुपए का नुकसान हुआ. देर से दिल्ली पहुँचा. घर वाले बहुत परेशान हुए. देवी माँ की कृपा से अगली फ्लाईट में जगह मिल गई वरना न जाने कितनी परेशानी उठानी पड़ती. इस सबके लिए कौन जिम्मेदार था, लालूजी और उनका मंत्रालय. पर लालूजी को तो हार पहनाये जा रहे हैं.

किसे चिंता है ग्राहक की?

Sunday, July 15, 2007

Bedrolls given in Indian trains – most unhygienic manner

On the nights of 13 and 14 July 2007, I had traveled by Shram Shakti Express between New Delhi to Kanpur and back. Indian Railways provide bedrolls in AC coaches. IRCTC had given contracts to private operators for this.

The contractors are required to comply with following conditions:

a) One bedroll kit should contain two bed sheets, one pillow, one pillow cover, one blanket, one face towel,

b) Bedrolls to be stored and transported in specially designed canvas bags,

c) Bedroll kit to be provided to passengers in tamper-proof eco-friendly carry bags with IRCTC logo printed on bags,

d) Blankets should washed/dry-cleaned every month.

Contractor did not comply with above requirements. Face towel was not provided. No canvas bags, no carry bags, blankets never washed/dry-cleaned. No responsible person is present in the train. Delivery boys are not aware of the name of the contract agency. I wrote a complaint in the complaint book provided by Ticket Examiner.

Bedrolls were tied in the cloth pieces, and were dragged on the floor.