भारत सरकार का एक मंत्रालय है - उपभोक्ता मामले, खाध्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय. इसके मंत्री हैं श्री शरद पवार, राज्य मंत्री हैं प्रो. के वी थामस. इस मंत्रालय के अंतर्गत एक विभाग है - उपभोक्ता मामले विभाग. इस विभाग के अंतर्गत है - भारतीय मानक ब्यूरो. भामाब्यूरो भारत की राष्ट्रीय मानक संस्था है. इस के महा-निदेशक हैं श्री शरद गुप्ता, आईएएस. अब यह मत पूछियेगा कि एक आईएएस इस साइंटिफिक संस्था में क्या कर रहा है? यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि यह सरकारी बाबू हर जगह घुसे हुए हैं और इन्होनें हर संस्था की हालत बुरी कर रखी है.
भामाब्यूरो, भारतीय संसद द्वारा पारित विधान "भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम १९८६" द्वारा प्रदत शक्ति से एक 'उत्पाद प्रमाणन योजना' चला रहा है जिसके अंतर्गत लाइसेंसधारी को मानक मुहर (आईएसआई मार्क) को अपने उत्पाद पर लगाने की स्वीकृति मिल जाती है. भामाब्यूरो की यह उत्पाद प्रमाणन योजना आईएसओ मार्गदर्शिका २८ पर आधारित है. इस योजना के अंतर्गत फैक्टरी की गुणता प्रबध पद्धति का मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें फेक्ट्री की उत्पाद निर्माण छमता, परीक्षण छमता, कर्मचारियों की योग्यता एवं छमता का मूल्यांकन शामिल है. उत्पाद की मानक अनुरूपता को जांचने के लिए फैक्टरी में उत्पाद के नमूनों का परीक्षण किया जाता है. इसके अलाबा फेक्ट्री से लिए गए नमूनों का स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में परीक्षण किया जाता है. सब कुछ सही पाए जाने पर ही मानक मुहर के उपयोग की स्वीकृति दी जाती है। इस मुहर का अर्थ यह है कि उत्पाद सम्बंधित राष्ट्रीय मानक की अपेक्षाओं के अनुरूप है.
पहले एक वर्ष में चार बार फेक्ट्री का निरीक्षण किया जाता था, एक वर्ष में उत्पाद के चार नमूनों का फेक्ट्री में परीक्षण किया जाता था. एक वर्ष में फेक्ट्री से लिए चार नमूनों का स्वतंत्र प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता था. एक वर्ष में उत्पाद के चार नमूने बाजार से खरीदे जाते थे और उनका स्वतंत्र प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता था. अब शायद सरकार और ब्यूरो को उपभोक्ता संरक्षण की उतनी चिंता नहीं रही. अब विधान में परिवर्तन कर दिया गया है - एक वर्ष में दो निरीक्षण, दो नमूने फेक्ट्री में, दो नमूने फेक्ट्री से लेकर और दो बाजार से खरीद कर परीक्षण करने का नियम बनाया गया है. इस नियम का भी पूरी तरह पालन नहीं किया जाता. न निरीक्षण पूरा होता है और न परीक्षण पूरा. कुछ केसेज में तो दो वर्ष बीत गए पर न निरीक्षण किया गया न परीक्षण.
एक और आघात जो इस योजना पर किया गया है वह है - अब अधिकतर निरीक्षण बाहर के लोगों से कराये जाते हैं. यह लोग भामाब्यूरो के निरीक्षकों के मुकाबले में योग्यता, अनुभव और ट्रेनिंग में काफी कमजोर हैं. एक मुख्य बात यह भी है कि इन बाहरी निरीक्षकों की सेवाएँ कानून का उल्लंघन करके ली जा रही हैं. इन बाहरी निरीक्षकों द्वारा अब तक जितने भी निरीक्षण किये गए हैं वह कानून की द्रष्टि से गैर-कानूनी हैं.
मैंने यह बात ब्यूरो और सरकार में हर स्तर पर उठा रखी है, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक. कुछ महीने पहले मेरा एक साक्षात्कार दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुआ था. पर न ब्यूरो में और न ही सरकार में इस पर कोई कार्यवाही की गई है.
यह कैसा उपभोक्ता संरक्षण है?