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Monday, August 08, 2011
ISI Mark - Has it become a tool for cheating consumer
Wednesday, July 20, 2011
ISI Mark – Has it become a Tool For Cheating Consumer
ISI Mark – Has it become a Tool For Cheating Consumer
In my earlier post, ISI Mark – Symbol of ‘Quality’ or ‘Cheating’? - I submitted that ISI Mark is no more seen as a symbol of quality by majority of consumers. Confidence generated in ISI Mark in last 50 plus years is being misused by BIS licensees to cheat the consumer. Statutory provisions of BIS Certification Regulations are being openly violated by a management indifferent to consumer interest. Number of complaints have been sent to BIS vigilance department, number of articles have been posted on my blog MANAK, number of RTI applications have been filed, but it could not make any dent in corruption apparatus. Has BIS created a national standard for administrative corruption. Those involved in corruption openly say that no body can do anything against them.
Tuesday, July 19, 2011
ISI Mark – Symbol of ‘Quality’ or ‘Cheating’?
Citizen Audit of BIS Product Certification (ISI Mark) Scheme
No of inspections
Testing of ISImarked productsFriday, February 04, 2011
आईएसआई मार्क और उत्पाद की गुणवत्ता ???
भारतीय मानक ब्यूरो (पहला नाम - भारतीय मानक संस्था, वर्ष १९४७ में गठित की गई) को भारतीय संसद द्वारा पारित विधान, भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम १९८६, के अंतर्गत गठित किया गया है. भामाब्यूरो केंद्र सरकार के 'उपभोक्ता मामले मंत्रालय' के नियंत्रण में एक स्वायत्त संस्था है. इस अधिनियम द्वारा प्रदत वैधानिक अधिकार से भामाब्यूरो एक 'उत्पाद प्रमाणन योजना' चला रहा है. यह उत्पाद प्रमाणन योजना १९५५ में आरंभ हुई थी. इसके अंतर्गत लाइसेंसधारी को प्रमाणन मुहर (आईएसआई मार्क) के स्व-उपयोग की स्वीकृति दी जाती है. भामब्यूरो अब तक विभिन्न उत्पाद निर्माताओं को ३५००० से अधिक लाइसेंस स्वीकृत कर चूका हैं, जिसमें कृषि, वस्त्रादि, पेय/खाद्य पदार्थ, विद्युत्/इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद, रसोई गैस के सिलिंडर एवं वाल्व, गहराई से पानी निकलने के हस्तचालित पम्प, स्टील/पीवीसी निर्मित पीने/कृषि योग्य जल आपूर्ति के ट्यूब्स शामिल है. भारतीय उपभोक्ता ने आईएसआई मार्क में अपना पूरा विश्वास व्यक्त किया, पर पिछले कुछ वर्षों से आईएसआई मार्क से उपभोक्ताओं का विश्वास उठता जा रहा है. कुछ लोग तो यहाँ तक कहते सुने जाते हैं कि स्वयं भामब्यूरो के कर्मचारी आईएसआई मार्क उत्पाद नहीं खरीदते.
भामाब्यूरो उत्पाद प्रमाणन योजना एक स्वैच्छिक योजना है और अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संस्था (आईएसओ) द्वारा प्रकाशित मार्गदर्शिका २८ पर आधारित है. इस मार्गदर्शिका के अंतर्गत भामाब्यूरो फैक्टरी का प्रारंभिक परीक्षण एवं उस की 'गुणता प्रबंध पद्धति' का मूल्यांकन करता है और उत्पाद की गुणवत्ता की मानकों से अनुरूपता को निर्धारित व स्वीकृत करता है. यह स्वीकृति फैक्टरी के गुणता प्रबंध पद्धति की निगरानी व फैक्टरी से लिए गए नमूनों की स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में जांच के बाद ही दी जाती है. सभी भामाब्यूरो प्रमाणन भारतीय मानकों के अनुसार किए जातें हैं. भामब्यूरो अपनी लगातार निगरानी द्वारा ब्यूरो द्वारा प्रमाणित उत्पादों की गुणता पर पैनी नजर रखता है. इसके लिए ब्यूरो के अधिकारी समय-समय पर फेक्ट्री में बिना बताये जा कर इंस्पेक्शन करते हैं, फेक्ट्री और बाजार से उत्पाद के नमूने ले कर उनकी स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में गुणवत्ता जांच की जाती है. किसी प्रकार की कोई भी कमी पाए जाने पर उस का विस्तृत अध्ययन किया जाता है और मूल कारणों का पता लगाया जाता है और कमी के लिए जिम्मेदार कारणों को दूर किया जाता है. यदि उत्पाद निर्माता उस कमी को जल्दी दूर नहीं कर पाता है तब उस से आईएसआई मार्क लगाने का स्व-अधिकार वापस ले लिया जाता है. यह अधिकार उसे तब ही वापस मिलता है जब गुणवत्ता में कमी के सारे कारणों को प्रभावशाली तरीके से दूर कर दिया जाता है और ब्यूरो के सक्षम अधिकारी पूर्ण रूप से अपनी संतुष्टि कर लेते हैं. ऐसा न होने पर उत्पाद निर्माता से लाईसेंस वापस ले लिया जाता है. ग्राहक भी उत्पाद गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर ब्यूरो को शिकायत कर सकता है. ब्यूरो अधिकारी शिकायत की तुरंत जांच करते हैं और शिकायत सही पाए जाने पर ख़राब उत्पाद के स्थान पर सही उत्पाद दिलवाया जाता है.
यह बहुत अधिक दुःख का विषय है कि आईएसआई मार्क की अपनी गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है. इस के लिए ब्यूरो, ब्यूरो अधिकारी, ब्यूरो की नीतियों और कार्यविधियों में बिना पूर्ण विचार के किये गए परिवर्तन, मंत्रालय का अनावश्यक हस्तक्छेप काफी हद तक जिम्मेदार हैं. ब्यूरो एक साइंटिफिक संस्था है पर काफी समय से इस के महानिदेशक और अन्य पदों पर आईएएस अधिकारियों की गैरकानूनी नियुक्ति की जा रही है. यह ब्यूरो की गिरती साख का मुख्य कारण है.
कहानी बहुत लम्बी है पर ग्राहकों को सुनानी जरूरी है. इस लिए मैं इसे एक लेख श्रंखला के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ. आगे के भागों में विस्तार से गुणवत्ता हनन की कथा पर चर्चा की जायेगी.
नोट - हर उत्पाद के लिए मानक मुहर अलग गजट की जाती है. इस के ऊपर भारतीय मानक का नंबर होता है और नीचे लाईसेंस नंबर.
Friday, September 17, 2010
वाटर फिल्टर्स और पीने का पानी - कितना सुरक्षित?

आपने अपनी रसोई में वाटर फ़िल्टर अवश्य ही लगा रखा होगा. इसके लिए काफी पैसे खर्च किये होंगे. यह सोच कर बहुत संतोष के साथ आप फ़िल्टर का पानी पीते होंगे कि यह पानी पूर्ण रूप से सुरक्षित है. परन्तु आज अखवार में छपी ख़बरों के अनुसार यह सही नहीं है. अधिकाँश वाटर फ़िल्टर वाइरस (विषाणु) को दूर नहीं करते. वाटर फ़िल्टर निर्माताओं के पूर्ण सुरक्षित पानी के दावे गलत हैं. पूरी जानकारी के लिए साथ की फोटो पर क्लिक करें. आन लाईन पढ़ने के लिए क्लिक करें. मैंने भामाब्यूरो की वेबसाईट पर देखा - केमिकल डिपार्टमेंट में एक समिति है एम्एचडी-२२ जिसने वाटर प्योरिफिकेशन सिस्टम पर मानक बनाया है जिस का नंबर है आई एस १४७२४. भामाब्यूरो ने १२ वाटर फ़िल्टर निर्माताओं को लाइसेंस दिए हैं जिन के अंतर्गत यह निर्माता अपने वाटर फिल्टर्स पर आई एस आई मुहर लगाते हैं.
पुणे स्थित नेशनल इंस्टीटयूट आफ विरोलोजी (एनआईवी) द्वारा की गई एक स्टडी में यह कहा गया है कि भारत में निर्मित आठ ब्रांड्स के वाटर फिल्टर्स में केवल दो ऐसे पाए गए जिन में विषाणु पूर्ण रूप से दूर कर दिए गए. लेकिन इस संस्था ने इन ब्रांड्स के नाम बताने से इनकार कर दिया. ग्राहकों को यह अधिकार है कि इन ब्रांड्स के बारे उन्हें जानकारी दी जाय. मैं सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत यह जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करूंगा. एनआईवी भामाब्यूरो की समिति का सदस्य है.
इस स्टडी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में वाटर फ़िल्टर जैसे उपकरणों की जांच करने के कोई मानक नहीं हैं. एनआईवी ने अपनी स्टडी के लिए अमरीका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के मानकों का प्रयोग किया. रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मानक ब्यूरो समिति इस रिपोर्ट की जांच करेगी. भामाब्यूरो को एनआईवी से यह जानकारी लेकर देखना चाहिए कि वह कौन लाइसेंसधारी हैं जिनके वाटर फिल्टर्स टेस्ट में फेल हुए है और फिर उन पर आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए. मैं भी भामाब्यूरो से यह जानकारी लेने का प्रयत्न करूंगा पर भामाब्यूरो से आसानी से जानकारी नहीं मिलती, इस लिए मुझे सूचना अधिकार अधिनियम का सहारा लेना होगा.
यह बहुत ही दुःख का विषय है कि नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की चिंता न तो उत्पाद/सेवा प्रदाता करते हैं और न ही सरकार. रोज अखवारों में दिल घबरा देने वाली ख़बरें आ रही हैं. नकली दूध, फल और सब्जिओं में खतरनाक रसायन, बोतल बंद पानी में खतरनाक रसायन के बारे में अखवारों में आता रहा है. कल शहद में एंटीबायोटिक्स होने के बारे में खबर थी. आज फिल्टर्ड पानी के सुरक्षित न होने की खबर है. कहते हैं ग्राहक राजा है. यह कैसा राजा है जिसे हर समय अपने जीवन की सुरक्षा का खतरा लगा रहता है?
Tuesday, September 14, 2010
सीवीसी, भ्रष्टाचार और नागरिक
फोटो पर क्लिक करें और यह खबर पढ़ें. सरकार के एक मंत्री का कहना है कि जो सरकारी बाबू अपने कार्यकाल में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते थे पर निभा नहीं निभा पाए वह सेवा-निवृत्त होने के बाद संत हो जाते हैं. मंत्रीजी ने नाम तो नहीं लिया पर लगता है कि उनका ईशारा अभी-अभी सेवा-निवृत्त हुए केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त श्री प्रत्यूष सिन्हा की तरफ है. इन सरकारी बाबू ने सेवा-निवृत्त होने के बाद शायद यह कहा कि एक तिहाई भारतीय जबदस्त भ्रष्टाचारी हैं, और आधे भारतीय भ्रष्टाचार की लक्ष्मण रेखा पार कर चुके या करने वाले हैं.बात तो मंत्रीजी ने सही कही है. ऐसा अक्सर सेवा-निवृत्त बाबुओं के साथ होता है. पर सिन्हा साहब ने जो कहा है उस में भी कुछ सच्चाई है. भ्रष्टाचार का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है और लगातार नए लोग इस में शामिल होते जा रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की इच्छा शक्ति बहुत कमजोर है. संगठित तौर पर जो भ्रष्टाचार होता है उस के खिलाफ मुहिम छेड़ने के बजाय सरकार उस में शामिल लोगों के साथ खड़ी नजर आती है. साझा धन खेलों का उदाहरण सब के सामने है. इन खेलो में भ्रष्टाचार से जितना काला धन पैदा हुआ है उस से इन खेलों को अगर काला धन खेल कहा जाय तो गलत नहीं होगा.
सिन्हा साहब के बारे में मेरा अनुभव संतोषदायक नहीं है. भारतीय मानक ब्यूरो में हुए भ्रष्टाचार पर मेरी शिकायतों पर उनका व्यवहार बहुत दुखद रहा. जिन ब्यूरो अधिकारियों और ब्यूरो के केन्द्रीय सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) के खिलाफ शिकायतें की गईं, सिन्हा साहब ने उन शिकायतों को वापस उन्हें ही भेज दिया और यह भी लिख दिया कि वह जो ठीक समझें कार्यवाही करें और केन्द्रीय सतर्कता आयोग को कोई रिपोर्ट भेजने की जरूरत नहीं है. परिणाम स्वरुप सारी शिकायतें दबा दी गईं. मुझे चुप कराने के लिए भी यह कहा गया कि जब तक सिन्हा साहब सीवीसी हैं कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. एक शिकायत सीवीसी में रजिस्टर भी हो गई, पर उस को भी सीवीओ को ही भेज दिया गया, हाँ यह जरूर कहा गया कि तीन महीने में अपनी रिपोर्ट आयोग को भेजें. आज आठ महीने हो रहे हैं, सीवीसी की वेबसाईट पर यही लिखा आ रहा है कि सीवीओ ने अभी तक रिपोर्ट नहीं भेजी है. यह है सिन्हा साहब के काम का एक छोटा हिस्सा जो उन्होंने सीवीसी के रूप में किया. अब वह सेवा-निवृत्त हो गए हैं और आधे भारतीय नागरिकों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं. मंत्रीजी के अनुसार वह अब संत हो गए हैं.
Thursday, September 02, 2010
यह कैसा उपभोक्ता संरक्षण है?
भारत सरकार का एक मंत्रालय है - उपभोक्ता मामले, खाध्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय. इसके मंत्री हैं श्री शरद पवार, राज्य मंत्री हैं प्रो. के वी थामस. इस मंत्रालय के अंतर्गत एक विभाग है - उपभोक्ता मामले विभाग. इस विभाग के अंतर्गत है - भारतीय मानक ब्यूरो. भामाब्यूरो भारत की राष्ट्रीय मानक संस्था है. इस के महा-निदेशक हैं श्री शरद गुप्ता, आईएएस. अब यह मत पूछियेगा कि एक आईएएस इस साइंटिफिक संस्था में क्या कर रहा है? यही तो इस देश का दुर्भाग्य है कि यह सरकारी बाबू हर जगह घुसे हुए हैं और इन्होनें हर संस्था की हालत बुरी कर रखी है.
भामाब्यूरो, भारतीय संसद द्वारा पारित विधान "भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम १९८६" द्वारा प्रदत शक्ति से एक 'उत्पाद प्रमाणन योजना' चला रहा है जिसके अंतर्गत लाइसेंसधारी को मानक मुहर (आईएसआई मार्क) को अपने उत्पाद पर लगाने की स्वीकृति मिल जाती है. भामाब्यूरो की यह उत्पाद प्रमाणन योजना आईएसओ मार्गदर्शिका २८ पर आधारित है. इस योजना के अंतर्गत फैक्टरी की गुणता प्रबध पद्धति का मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें फेक्ट्री की उत्पाद निर्माण छमता, परीक्षण छमता, कर्मचारियों की योग्यता एवं छमता का मूल्यांकन शामिल है. उत्पाद की मानक अनुरूपता को जांचने के लिए फैक्टरी में उत्पाद के नमूनों का परीक्षण किया जाता है. इसके अलाबा फेक्ट्री से लिए गए नमूनों का स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में परीक्षण किया जाता है. सब कुछ सही पाए जाने पर ही मानक मुहर के उपयोग की स्वीकृति दी जाती है। इस मुहर का अर्थ यह है कि उत्पाद सम्बंधित राष्ट्रीय मानक की अपेक्षाओं के अनुरूप है.
पहले एक वर्ष में चार बार फेक्ट्री का निरीक्षण किया जाता था, एक वर्ष में उत्पाद के चार नमूनों का फेक्ट्री में परीक्षण किया जाता था. एक वर्ष में फेक्ट्री से लिए चार नमूनों का स्वतंत्र प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता था. एक वर्ष में उत्पाद के चार नमूने बाजार से खरीदे जाते थे और उनका स्वतंत्र प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता था. अब शायद सरकार और ब्यूरो को उपभोक्ता संरक्षण की उतनी चिंता नहीं रही. अब विधान में परिवर्तन कर दिया गया है - एक वर्ष में दो निरीक्षण, दो नमूने फेक्ट्री में, दो नमूने फेक्ट्री से लेकर और दो बाजार से खरीद कर परीक्षण करने का नियम बनाया गया है. इस नियम का भी पूरी तरह पालन नहीं किया जाता. न निरीक्षण पूरा होता है और न परीक्षण पूरा. कुछ केसेज में तो दो वर्ष बीत गए पर न निरीक्षण किया गया न परीक्षण.
एक और आघात जो इस योजना पर किया गया है वह है - अब अधिकतर निरीक्षण बाहर के लोगों से कराये जाते हैं. यह लोग भामाब्यूरो के निरीक्षकों के मुकाबले में योग्यता, अनुभव और ट्रेनिंग में काफी कमजोर हैं. एक मुख्य बात यह भी है कि इन बाहरी निरीक्षकों की सेवाएँ कानून का उल्लंघन करके ली जा रही हैं. इन बाहरी निरीक्षकों द्वारा अब तक जितने भी निरीक्षण किये गए हैं वह कानून की द्रष्टि से गैर-कानूनी हैं.
मैंने यह बात ब्यूरो और सरकार में हर स्तर पर उठा रखी है, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक. कुछ महीने पहले मेरा एक साक्षात्कार दूरदर्शन पर भी प्रसारित हुआ था. पर न ब्यूरो में और न ही सरकार में इस पर कोई कार्यवाही की गई है.
यह कैसा उपभोक्ता संरक्षण है?
Wednesday, September 01, 2010
BIS misleads consumers about its Hallmarking Scheme for Gold Jewellery
If you visit National Portal of India PAGE on ‘Bureau of Indian Standards’, you will find following information:
Hallmarking - Hallmarking of Gold Jewellery started in April 2000 on voluntary basis under BIS Act, 1986.
Similarly, on BIS website PAGE on ‘BIS Certification Scheme for hallmarking of Gold Jewellery’, you will find following information:
Government of
Both these statements are misleading as this BIS Hallmarking Scheme has no legal backing of BIS Act, 1986, Rules and regulations.
Section 15 (1) of BIS Act, 1986 says that the Bureau may, by order, grant, renew, suspend or cancel a license in such manner as may be determined by regulations. BIS, so far, has not made any Regulations for operating Certification Scheme for Hallmarking of Gold Jewellery.
This issue has been raised by Mr. A L Makhijani, President of Forum for Good Governance, in September 2009 with BIS through a RTI application. BIS gave incomplete and misleading information. Mr. Makhijani submitted a representation to the Prime Minister in January 2010 with copies to Shri Sharad Pawar (Minster in-charge of BIS) and Secretary of Department of Consumer affairs, controlling ministry of BIS.
I have also raised this issue on my blog MANAK - RTI exposes another illegality in BIS – Hallmarking Scheme
Till date, BIS and Government have not taken any action to notify regulations for Hallmarking Scheme. The scheme continues to be run without any legal backing of BIS Act; and both BIS and Government continue to mislead the consumer.
This is a very unfortunate situation. What a consumer is supposed to do when Government itself violates the law? Prime Minister has been informed about this illegality. Mainister in-charge of BIS and Secretary of controlling ministry have also been similarly informed. But no body is ready to do any thing. Sometimes I feel that the both BIS and Government are cheating the Indian consumer.
Saturday, August 28, 2010
Sub-standard ISI Marked Products
Bureau of Indian Standards (BIS) operates a third-party product certification scheme under which it grants licenses to product manufacturers to use ISI Mark on their products. ISI mark on a iproduct means that the product conforms to the relevant Indian Standard. For the benefit of consumers, BIS issues advertisements in the media. One such advertisement issued by BIS is shown in the image. CLICK to read it.In this advertisement, BIS has used a term 'sub-standard' but has not defined it. Does it mean that any product not having this mark is 'sub-standard', or a product having this mark can also be 'sub-standard'? I wrote an e-mail to BIS bit BIS did not reply. I sent three reminders but still no reply. Is BIS really concerned about the interest and safety of consumers., or issuing this advertisement is only a formality to indicate so in its annual report or satisfying consumer NGOs?
To read my e-mail, CLICK here.
I am now filing a RTI application to get the information. I will share it on this blog as soon as I get it.
Wednesday, February 17, 2010
Sharad Pawar's ministry compromises interest of Indian Consumer - BIS Registration Scheme notified
Details of the registration scheme (closely guarded secret of DOCA and BIS) are now available in BIS Rules, 1987. A new chapter IV A has been inserted. Notification issued in this regard will posted on the blog shortly. This notification has been merged in the BIS Rules.
gives general guidelines for a specific product certification system.
It is applicable to a third-party product certification system for determining the conformity of a product with specified requirements through initial testing of samples of the product, assessment and surveillance of the involved quality system, and surveillance by testing of product samples taken from the factory or the open market, or both. ISO/IEC Guide 28:2004 addresses conditions for use of a mark of conformity and conditions for granting a certificate of conformity.
BIS Product Certification scheme was first distorted by Simplified Procedure and now further distorted by this scheme. All essential elements like
determining the conformity of a product with specified requirements through initial testing of samples of the product, assessment and surveillance of the involved quality system, and surveillance by testing of product samples taken from the factory or the open market, or both, are missing in this Registration Scheme.
Why first BIS and now BIS plus ministry are out to compromise the interest of the consumer? All controls on manufacturers
are being
relaxed one after the other. Appointment of agents, grant of licenses based on the report of chartered engineer, recognizing self-test report and now this registration scheme are all to please the manufacturers and sacrifice the interest of the consumer.
