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Thursday, January 13, 2011

ग्राहक बेचारा क्या करे?

कीमतें बढ़ रही हैं, लगातार बढती जा रही हैं. कीमतें कभी कम होंगी, इस पर तो अब सरकार को भी कोई भरोसा नहीं रहा. मौसम ठीक रहेगा, पैदावार ज्यादा होगी, उस से कीमतें कुछ समय के लिए कुछ कम हो गईं तो समझो ईश्वर की कृपा.

प्रधानमंत्री ने बैठक बुलाई, कुछ नतीजा नहीं निकला. बैठक बुलाई थी कीमतें कैसे कम करें. पवार ने कहा अब मैं चीनी की कीमतें बढ़ाऊंगा, खूब माल कमाऊँगा, इस लिए चीनी का निर्यात खोलो. सरकार ने हाथ खड़े कर दिए. राजकुमार ने कहा अगर इंदिरा जी जैसी सरकार होती तब कीमत कम कर देते. अब मनमोहन की गठबंधन सरकार है, कोई घटक उनकी सुनता ही नहीं, मजबूरी है गठबंधन की, कीमतें कैसे कम करें? अब यह कौन बताये कि इंदिरा की सरकार में कीमतों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई थी. बैसे देखा जाय तब कांग्रेस यह कह रही है कि गलती जनता की है , केवल कांग्रेस की सरकार क्यों नहीं बनाई? बीच में पवार को क्यों घुसा दिया? अब भुगतो.

प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हैं पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ कर अर्थशास्त्र भूल गए. चिदम्बरम भी अर्थशास्त्री हैं, बेकार साबित हुए, अम्मा ने कहा अब तुम देश का सारा आतंकवाद बीजेपी और आरएसएस के मत्थे मढ़ दो. हिन्दू संसार के सब से भयंकर आतंकवादी हैं इसे साबित करके दिखाओ. वह इस में लग गए. अब कीमतें कौन कम करेगा? पवार, जिसे कीमतों पर नियंत्रण रखना था, वह ही तो कीमतें बढ़ा रहा है.

अब बेचारा ग्राहक क्या करे?

Tuesday, August 31, 2010

क्या भारत सरकार एक अच्छी सेवा प्रदाता है?

मैं नहीं जानता कि आप का उत्तर क्या होगा. मेरा उत्तर है - भारत सरकार एक अच्छी सेवा प्रदाता नहीं है. आप कोई भी सेवा ले लीजिये, रेल, बस, पानी, विजली, कर संग्रह, नगर निगम, सुरक्षा, न्याय, फोन, आप का अनुभव सुखद नहीं होगा. हर समय आप को यही महसूस होगा कि आप की परेशानी सुनने और उसे दूर करने की किसी को कोई चिंता नहीं है. बल्कि आप को ऐसा लगेगा कि आप को अनावश्यक तंग किया जा रहा है. नियम इस तरह बनाए जाते हैं कि सरकारी बाबू आप को बड़ी आसानी से उलझा देगा और आप की मानसिक शांति छीन लेगा. नियमों के सरलीकरण की बातें तो की जाती हैं पर कहीं न कहीं कोई ऐसा ऐसा प्रावधान घुसा दिया जाता है कि नियम और कठिन हो जाता जाता है.

मैं कल सेवा कर (सर्विस टेक्स) के नेहरु प्लेस स्थित कार्यालय में गया. इस कार्यालय से सरकार को करोड़ों रूपए का राजस्व मिलता है, पर लगता है सरकार उसका नगण्य प्रतिशत ही कार्यालय के रख-रखाब पर खर्च करती है. एक 'सहायता केंद्र' है जहाँ आगंतुकों के लिए दो टूटी हुई कुर्सियां रखी हैं. पीने का पानी तो है पर पीने के लिए ग्लास नहीं हैं. इस केंद्र पर कोई कर्मचारी उपलब्ध नहीं था. आगंतुक एक दूसरे से और चपरासी से पूछ रहे थे कि यह श्रीमान कब आयेंगे? सफाई के बारे में अगर आप पूछें तब उसे निम्न स्तर का ही कहा जा सकता है.

मैं एक अधिकारी के कमरे मैं गया तब वहां भी दो टूटी कुर्सियों का सामना हुआ. जब बैठने लगा तब अधिकारी ने कहा, 'जरा ध्यान से, कुर्सी टूटी है, चोट न लग जाए'. वह खुद भी जिस कुर्सी पर बैठे थे, उनके पद के अनुरूप नहीं थी. ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि यह एक ऐसे अधिकारी का कमरा है जो सरकार के लिए कर संग्रह करता है. उनके कमरे के बाहर जो हाल था उस का हाल भी कोई अच्छा नहीं था.

यह कैसी सरकार है जो न तो अपने ग्राहकों को सही आदर देती है और न ही अपने कर्मचारियों को? क्या कार्यालय प्रमुख का कमरा अच्छी तरह सजा कर सरकार के कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? क्या दूसरे अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति सरकार का कोई दायित्व नहीं है? ऐसे गंदे और दम-घुटाऊ वातावरण में कोई कैसे कुशलता-पूर्वक कार्य कर सकता है?

मैं तो वहां कुछ समय के लिए गया था और मुझे अच्छा नहीं लगा. जो लोग वहां दिन भर रह कर काम करते हैं उनकी हालत सोच कर मैं घबराता हूँ.