मैं नहीं जानता कि आप का उत्तर क्या होगा. मेरा उत्तर है - भारत सरकार एक अच्छी सेवा प्रदाता नहीं है. आप कोई भी सेवा ले लीजिये, रेल, बस, पानी, विजली, कर संग्रह, नगर निगम, सुरक्षा, न्याय, फोन, आप का अनुभव सुखद नहीं होगा. हर समय आप को यही महसूस होगा कि आप की परेशानी सुनने और उसे दूर करने की किसी को कोई चिंता नहीं है. बल्कि आप को ऐसा लगेगा कि आप को अनावश्यक तंग किया जा रहा है. नियम इस तरह बनाए जाते हैं कि सरकारी बाबू आप को बड़ी आसानी से उलझा देगा और आप की मानसिक शांति छीन लेगा. नियमों के सरलीकरण की बातें तो की जाती हैं पर कहीं न कहीं कोई ऐसा ऐसा प्रावधान घुसा दिया जाता है कि नियम और कठिन हो जाता जाता है.
मैं कल सेवा कर (सर्विस टेक्स) के नेहरु प्लेस स्थित कार्यालय में गया. इस कार्यालय से सरकार को करोड़ों रूपए का राजस्व मिलता है, पर लगता है सरकार उसका नगण्य प्रतिशत ही कार्यालय के रख-रखाब पर खर्च करती है. एक 'सहायता केंद्र' है जहाँ आगंतुकों के लिए दो टूटी हुई कुर्सियां रखी हैं. पीने का पानी तो है पर पीने के लिए ग्लास नहीं हैं. इस केंद्र पर कोई कर्मचारी उपलब्ध नहीं था. आगंतुक एक दूसरे से और चपरासी से पूछ रहे थे कि यह श्रीमान कब आयेंगे? सफाई के बारे में अगर आप पूछें तब उसे निम्न स्तर का ही कहा जा सकता है.
मैं एक अधिकारी के कमरे मैं गया तब वहां भी दो टूटी कुर्सियों का सामना हुआ. जब बैठने लगा तब अधिकारी ने कहा, 'जरा ध्यान से, कुर्सी टूटी है, चोट न लग जाए'. वह खुद भी जिस कुर्सी पर बैठे थे, उनके पद के अनुरूप नहीं थी. ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा था कि यह एक ऐसे अधिकारी का कमरा है जो सरकार के लिए कर संग्रह करता है. उनके कमरे के बाहर जो हाल था उस का हाल भी कोई अच्छा नहीं था.
यह कैसी सरकार है जो न तो अपने ग्राहकों को सही आदर देती है और न ही अपने कर्मचारियों को? क्या कार्यालय प्रमुख का कमरा अच्छी तरह सजा कर सरकार के कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? क्या दूसरे अधिकारियों और कर्मचारियों के प्रति सरकार का कोई दायित्व नहीं है? ऐसे गंदे और दम-घुटाऊ वातावरण में कोई कैसे कुशलता-पूर्वक कार्य कर सकता है?
मैं तो वहां कुछ समय के लिए गया था और मुझे अच्छा नहीं लगा. जो लोग वहां दिन भर रह कर काम करते हैं उनकी हालत सोच कर मैं घबराता हूँ.
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Tuesday, August 31, 2010
Thursday, August 26, 2010
ग्राहक शिकायत क्यों करते हैं?
क्या आप ने कभी ऐसा ग्राहक देखा है जो कहता हो, 'शिकायत करना मेरा शौक है'? शिकायत करना और उसे उस के सही अंजाम तक ले जाना एक बहुत मुश्किल काम है, जिस में पैसा, समय और ऊर्जा सब बरबाद होते हैं. बहुत कम प्रतिशत है ऐसी शिकायतों का जिन के परिणाम से ग्राहक पूरी तरह संतुष्ट हो. अक्सर ग्राहक शिकायतों को बीच में ही छोड़ देते हैं. मेरा एक मित्र कहता है कि अगर आप को किसी से दुश्मनी निकालनी हो तब उस से किसी उत्पाद-सेवा विक्रेता की शिकायत करवा दीजिये, और फिर उसे शिकायत के भंवर में छटपटाता हुआ देख कर खुश होते रहिये.
आप को ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आप की परेशानी में तुरंत आप को यह सलाह दे देंगे कि शिकायत कर दो. यह वह लोग होते हैं जिन्होनें या तो कभी शिकायत की ही नहीं होती या जिन्होनें शिकायत तो की थी पर उस के बाद कभी शिकायत न करने की प्रतिज्ञा भी कर ली थी. भारत में शिकायतकर्ता को पसंद नहीं किया जाता. एक छोटे से उत्पाद-सेवा विक्रेता से ले कर प्रधानमंत्री कार्यालय या राष्ट्रपति सचिवालय तक सब शिकायतकर्ता को शिकायती नजरों से देखते हैं. उनका वश चले तो शिकायत करना एक अपराध घोषित कर दें.
ग्राहक जब सब तरफ से निराश हो जाता है तब शिकायत करता है. अगर उस की शिकायत को पहले स्तर पर ही निपटा दिया जाय तब उसे ग्राहक अदालतों तक जाने की जरूरत ही न पड़े. लेकिन असंतुष्ट ग्राहक की बात ही कोई सुनना नहीं चाहता. उस के हर तर्क को नकार दिया जाता है. जब वह अदालत में पहुँचता है तब उस के खिलाफ वकील खड़े कर दिए जाते हैं. असंतुष्ट ग्राहक को सौ रूपए का मुआवजा नहीं देंगे पर वकीलों को हजारों रूपए दे देंगे. मेरा मानना है कि उत्पाद-सेवा विक्रेता अपने नकारात्मक व्यवहार से ग्राहक को शिकायत करने के लिए मजबूर कर देते हैं.
आप को ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आप की परेशानी में तुरंत आप को यह सलाह दे देंगे कि शिकायत कर दो. यह वह लोग होते हैं जिन्होनें या तो कभी शिकायत की ही नहीं होती या जिन्होनें शिकायत तो की थी पर उस के बाद कभी शिकायत न करने की प्रतिज्ञा भी कर ली थी. भारत में शिकायतकर्ता को पसंद नहीं किया जाता. एक छोटे से उत्पाद-सेवा विक्रेता से ले कर प्रधानमंत्री कार्यालय या राष्ट्रपति सचिवालय तक सब शिकायतकर्ता को शिकायती नजरों से देखते हैं. उनका वश चले तो शिकायत करना एक अपराध घोषित कर दें.
ग्राहक जब सब तरफ से निराश हो जाता है तब शिकायत करता है. अगर उस की शिकायत को पहले स्तर पर ही निपटा दिया जाय तब उसे ग्राहक अदालतों तक जाने की जरूरत ही न पड़े. लेकिन असंतुष्ट ग्राहक की बात ही कोई सुनना नहीं चाहता. उस के हर तर्क को नकार दिया जाता है. जब वह अदालत में पहुँचता है तब उस के खिलाफ वकील खड़े कर दिए जाते हैं. असंतुष्ट ग्राहक को सौ रूपए का मुआवजा नहीं देंगे पर वकीलों को हजारों रूपए दे देंगे. मेरा मानना है कि उत्पाद-सेवा विक्रेता अपने नकारात्मक व्यवहार से ग्राहक को शिकायत करने के लिए मजबूर कर देते हैं.
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