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Wednesday, September 15, 2010

दिल्ली सरकार - ग्राहकों की दोस्त या दुश्मन


दिल्ली में जब विजली वितरण दिल्ली सरकार ने प्राईवेट वितरण कम्पनियों को सौंपा तब विजली के ग्राहकों ने सोचा था कि सरकारी ब्यूरोक्रेसी से छुटकारा मिलेगा और उचित दरों पर कट-रहित विजली मिलेगी. लेकिन कुछ ही समय बाद ग्राहकों को यह पता चल गया कि विजली वितरण का जनताकरण नहीं बल्कि सरकारी निजीकरण (या नेताकरण) हुआ है. पहले सरकारी विजली विभाग ग्राहकों को लूटता था अब यह बितरण कम्पनियां दिल्ली सरकार के साथ मिल कर ग्राहकों को लूट रही हैं.

पिछले दिनों में तो दिल्ली सरकार ने हद कर दी जब मुख्य मंत्री खुद दौड़ी हुई डीईआरसी के पास गईं और उसे विजली दरें कम करने का आदेश जारी करने से मना कर दिया. काफी जद्दो-जहद के बाद जब डीईआरसी ने आदेश सरकार के पास भेजा तब सरकार ने उसे नामंजूर कर दिया. इस आदेश के जारी न होने से ग्राहकों को कितना नुक्सान हुआ है यह जानने के लिए पास के फोटो पर क्लिक कीजिए. जिन ग्राहकों के वोट से यह सरकार तीसरी बार सत्ता में आई है, उन ग्राहकों के लिए यह सरकार काम नहीं करती. यह सरकार काम करती है अपनी पार्टनर विजली वितरण कम्पनियों के लिए.

अब दिल्ली में विजली ग्राहक ही तय करें कि दिल्ली सरकार उनकी दोस्त है या दुश्मन ???

Thursday, August 26, 2010

ग्राहक शिकायत क्यों करते हैं?

क्या आप ने कभी ऐसा ग्राहक देखा है जो कहता हो, 'शिकायत करना मेरा शौक है'? शिकायत करना और उसे उस के सही अंजाम तक ले जाना एक बहुत मुश्किल काम है, जिस में पैसा, समय और ऊर्जा सब बरबाद होते हैं. बहुत कम प्रतिशत है ऐसी शिकायतों का जिन के परिणाम से ग्राहक पूरी तरह संतुष्ट हो. अक्सर ग्राहक शिकायतों को बीच में ही छोड़ देते हैं. मेरा एक मित्र कहता है कि अगर आप को किसी से दुश्मनी निकालनी हो तब उस से किसी उत्पाद-सेवा विक्रेता की शिकायत करवा दीजिये, और फिर उसे शिकायत के भंवर में छटपटाता हुआ देख कर खुश होते रहिये.

आप को ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आप की परेशानी में तुरंत आप को यह सलाह दे देंगे कि शिकायत कर दो. यह वह लोग होते हैं जिन्होनें या तो कभी शिकायत की ही नहीं होती या जिन्होनें शिकायत तो की थी पर उस के बाद कभी शिकायत न करने की प्रतिज्ञा भी कर ली थी. भारत में शिकायतकर्ता को पसंद नहीं किया जाता. एक छोटे से उत्पाद-सेवा विक्रेता से ले कर प्रधानमंत्री कार्यालय या राष्ट्रपति सचिवालय तक सब शिकायतकर्ता को शिकायती नजरों से देखते हैं. उनका वश चले तो शिकायत करना एक अपराध घोषित कर दें.

ग्राहक जब सब तरफ से निराश हो जाता है तब शिकायत करता है. अगर उस की शिकायत को पहले स्तर पर ही निपटा दिया जाय तब उसे ग्राहक अदालतों तक जाने की जरूरत ही न पड़े. लेकिन असंतुष्ट ग्राहक की बात ही कोई सुनना नहीं चाहता. उस के हर तर्क को नकार दिया जाता है. जब वह अदालत में पहुँचता है तब उस के खिलाफ वकील खड़े कर दिए जाते हैं. असंतुष्ट ग्राहक को सौ रूपए का मुआवजा नहीं देंगे पर वकीलों को हजारों रूपए दे देंगे. मेरा मानना है कि उत्पाद-सेवा विक्रेता अपने नकारात्मक व्यवहार से ग्राहक को शिकायत करने के लिए मजबूर कर देते हैं.