
भारत का लगभग हर नागरिक रेल में यात्रा करता है और इस नाते रेल सेवाओं का ग्राहक है. इस सेवा में कोई स्पर्धा नहीं है. ले देकर एक ही रेल सेवा है और उसे सरकार चलाती है. एक सही गुणवत्ता की रेल सेवा प्रदान करने के दावे तो बहुत कुछ किये जाते हैं पर यह सब दावे खोखले हैं. इस का कारण है, सरकार/मंत्री स्तर पर जबाबदेही का न होना. इस स्तर पर एक गैरजिम्मेदारी का माहौल है, जिसका का प्रभाव निचले स्तरों पर पड़ा है और पूरे रेल ढाँचे में गैरजिम्मेदारी का माहौल नजर आता है.
रेल के अन्दर खाने की सेवाओं की अगर बात की जाय तब ऐसा ही माहौल नजर आता है. यह सेवाएँ इंडियन रेलवे केटरिंग एवं टूरिज्म कारपोरेशन (आईआरसीटीसी) प्रदान करता है. भारतीय रेल की प्रतिष्ठित राजधानी एवं शताब्दी एक्सप्रेस के मीनू कार्ड पर नजर डालिए (फोटो पर क्लिक करें). अब हकीकत में क्या होता है इसकी जानकारी मैं आपको देता हूँ. यह बता दूं कि मैं शताब्दी एक्सप्रेस से नियमित यात्रा करता हूँ. आईआरसीटीसी जो खाद्य सामग्री ग्राहकों को उपलब्ध कराता है उस के पैसे पहले ही ले लिए जाते हैं. यह सेवा प्रदान करने के लिए आईआरसीटीसी टेंडरों के माध्यम से केटरिंग एजेंसिओं को ठेका देता है.
खाद्य पदार्थ रेल डिब्बे में जहाँ रखे जाते हैं वहां की सफाई को उच्च स्तर का नहीं कहा जा सकता. पानी गर्म करने के लिए जो उपकरण इस्तेमाल किये जाते हैं उन की साफ़-सफाई का कोई प्रबंध नजर नहीं आता. गर्म पानी सर्व करने के फ्लास्क और कप को देख कर चाय/काफी पीने का मन नहीं करता. लगभग ७८ यात्रियों को सर्व करने के लिए केवल दो वेटर हैं, फ्लास्क की संख्या बहुत कम है. इसके कारण डिब्बे के दूसरे हिस्से में बैठे यात्रियों को सेवा देर से मिलती है. डिब्बे के पास के हिस्से में बैठे यात्री जब चाय/काफी पी लेते हैं तब उन फ्लास्कों में दूसरे यात्रियों को सर्व किया जाता है. प्लास्टिक ट्रे टेढ़ी हो गई हैं. रेल के झटकों में चाय इत्यादि कपड़ों पर गिरने का डर रहता है. कभी-कभी पेपर कप चाय पीने के लिए दिए जाते हैं, यह गर्म हो जाते हैं और चाय पीने में काफी दिक्कत होती है.
नई दिल्ली - कालका शताब्दी में मैंने ९ सितम्बर को यात्रा की. मैं डिब्बे के दूसरे हिस्से में था. पानी की बोतल रेल चलने के २० मिनट बाद मिली. अखवार ४० मिनट बाद मिला और वह भी जो बच गया. सुबह की चाय में चाय का एक बेग और दूध का एक पेकेट कम मिला (मीनू कार्ड के अनुसार इनकी संख्या २ होनी चाहिए थी पर मिला एक). नाश्ते के साथ चाय में भी यही हाल था. यह सिर्फ मेरे साथ नहीं था. पास में बैठे और यात्रियों के साथ भी यही हुआ. लगभग १२०० यात्री शताब्दी में यात्रा करते हैं. अंदाजा लगाइए, २४०० टी बेग और २४०० दूध के पेकेट कम सर्व करके ठेकेदार ने कितने पैसे बचाए. ११ सितम्बर को मैं वापस आया. यही हाल शाम की चाय में हुआ. खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता आईआरसीटीसी कैसे सुनिश्नित करता है, यह जानने के लिए मैंने आरटीआई में अर्जी दी पर कोई जानकारी अभी तक नहीं मिली है. पुनः एक और अर्जी देने जा रहा हूँ.
रेलों में चाय कैसे बनती है यह देखने के लिए क्लिक करें.
मैं अगर यह कहूं कि रेल में खान-पान से सम्बंधित सेवाओं की गुणवत्ता सही नहीं है तो गलत नहीं होगा. भारत सरकार/रेल मंत्रालय/आईआरसीटीसी ग्राहकों के साथ अन्याय कर रहे हैं, उनकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं.