फोटो पर क्लिक करें और यह खबर पढ़ें. सरकार के एक मंत्री का कहना है कि जो सरकारी बाबू अपने कार्यकाल में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते थे पर निभा नहीं निभा पाए वह सेवा-निवृत्त होने के बाद संत हो जाते हैं. मंत्रीजी ने नाम तो नहीं लिया पर लगता है कि उनका ईशारा अभी-अभी सेवा-निवृत्त हुए केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त श्री प्रत्यूष सिन्हा की तरफ है. इन सरकारी बाबू ने सेवा-निवृत्त होने के बाद शायद यह कहा कि एक तिहाई भारतीय जबदस्त भ्रष्टाचारी हैं, और आधे भारतीय भ्रष्टाचार की लक्ष्मण रेखा पार कर चुके या करने वाले हैं.बात तो मंत्रीजी ने सही कही है. ऐसा अक्सर सेवा-निवृत्त बाबुओं के साथ होता है. पर सिन्हा साहब ने जो कहा है उस में भी कुछ सच्चाई है. भ्रष्टाचार का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है और लगातार नए लोग इस में शामिल होते जा रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की इच्छा शक्ति बहुत कमजोर है. संगठित तौर पर जो भ्रष्टाचार होता है उस के खिलाफ मुहिम छेड़ने के बजाय सरकार उस में शामिल लोगों के साथ खड़ी नजर आती है. साझा धन खेलों का उदाहरण सब के सामने है. इन खेलो में भ्रष्टाचार से जितना काला धन पैदा हुआ है उस से इन खेलों को अगर काला धन खेल कहा जाय तो गलत नहीं होगा.
सिन्हा साहब के बारे में मेरा अनुभव संतोषदायक नहीं है. भारतीय मानक ब्यूरो में हुए भ्रष्टाचार पर मेरी शिकायतों पर उनका व्यवहार बहुत दुखद रहा. जिन ब्यूरो अधिकारियों और ब्यूरो के केन्द्रीय सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) के खिलाफ शिकायतें की गईं, सिन्हा साहब ने उन शिकायतों को वापस उन्हें ही भेज दिया और यह भी लिख दिया कि वह जो ठीक समझें कार्यवाही करें और केन्द्रीय सतर्कता आयोग को कोई रिपोर्ट भेजने की जरूरत नहीं है. परिणाम स्वरुप सारी शिकायतें दबा दी गईं. मुझे चुप कराने के लिए भी यह कहा गया कि जब तक सिन्हा साहब सीवीसी हैं कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता. एक शिकायत सीवीसी में रजिस्टर भी हो गई, पर उस को भी सीवीओ को ही भेज दिया गया, हाँ यह जरूर कहा गया कि तीन महीने में अपनी रिपोर्ट आयोग को भेजें. आज आठ महीने हो रहे हैं, सीवीसी की वेबसाईट पर यही लिखा आ रहा है कि सीवीओ ने अभी तक रिपोर्ट नहीं भेजी है. यह है सिन्हा साहब के काम का एक छोटा हिस्सा जो उन्होंने सीवीसी के रूप में किया. अब वह सेवा-निवृत्त हो गए हैं और आधे भारतीय नागरिकों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं. मंत्रीजी के अनुसार वह अब संत हो गए हैं.