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India Against Corruption - A Jan Lokpal Bill has been designed which has strong measures to bring all corrupt people to book. Join the cause and fight to force politicians to implement this powerful bill as an act in the parliament.

Saturday, August 30, 2008

लालू की रेल, हो गई फेल

पिछले दिनों मुझे ताज एक्सप्रेस से आगरा जाने का अवसर मिला। मेरे पास में गुजरात के एक सज्जन बैठे थे जो अपने परिवार के साथ ताजमहल देखने जा रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वह वर्ष १९७५ में ताजमहल देखने आए थे और इसी ताज एक्सप्रेस में यात्रा की थी। उनकी बेटी अमरीका में रहती है और आजकल भारत आई हुई है। उसके बच्चे ताजमहल देखना चाहते हैं। आज वह उन्हें ताजमहल दिखाने ले जा रहे हैं। पिछली बार ताज एक्सप्रेस में उन्हें बहुत मजा आया था, इसलिए उन्होंने इस ट्रेन से ही आरक्षण करवाया। पर आज यह ट्रेन देख कर उन्हें बहुत निराशा हुई। ताजमहल के नाम पर जिस ट्रेन का नाम रखा गया हो, उस ट्रेन की ऐसी दयनीय स्थिति, कितनी शर्म की बात है। रेल मंत्री लालू प्रसाद की सारी दुनिया में तारीफ़ हो रही है कि उन्होंने भारतीय रेल को फायदे में ला दिया। ताज एक्सप्रेस को इतना गन्दा और घटिया करके यह जनाब हार पहनते फ़िर रहे हैं, शर्म आनी चाहिए इन्हें। यह सब सुन कर मैंने सोचा, लालू तुम्हारी रेल हो गई फेल।

कुछ देर बाद, उनकी बेटी के दोनों बच्चे उनके पास आए और बोले, 'नाना हम आपसे नाराज हैं। इतनी गन्दी ट्रेन है यह, और आप इस की तारीफ़ कर रहे थे। क्या ताज महल भी ऐसा ही होगा?' वह बेचारे चुप रहे। मैंने कहा, 'नहीं बच्चों ताज महल तो बहुत खूबसूरत है, तुम लोग देखोगे तो बहुत खुश हो जाओगे'। उन्होंने मेरी तरफ़ अविश्वास से देखा और अपनी सीट पर चले गए। मैंने मन में सोचा, ताजमहल तो बाकई बहुत सुंदर है और शायद इसलिए कि लालू ताजमहल को गन्दा नहीं कर पाये हैं।

जिन लालू की हर तरफ़ तारीफ़ होती है उन लालू की रेल को दो बच्चों ने कर दिया फेल

Sunday, August 24, 2008

दिल्ली के नागरिक आख़िर करें क्या?

मनमोहन जी का कहना है कि दिल्ली से ज्यादा हरा-भरा, साफ़-सुथरा और खूबसूरत शहर भारत में दूसरा नहीं है। मेरी राय इस बारे में बिल्कुल उलट है। में एक भुक्त भोगी हूँ और मनमोहन जी ने तो कभी कुछ भोगा ही नहीं। वह भारत के प्रधान मंत्री हें, इस लिए उनके बयान अखबारों में छपते हें। मैं एक आम नागरिक हूँ इस लिए मेरी कोई राय अखबार में नहीं छपती। भला हो ब्लाग्स का, कम से कम अपने ब्लाग पर तो अपनी बात कह लेता हूँ।

इस बार बात कुछ इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि अखबार वालों को दिल्ली की सड़कों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाना पड़ा। दिल्ली की सड़कों से ज्यादा ख़राब सड़कें शायद भारत में कहीं और नहीं होंगी। अगर यकीन न हो तो यह तस्वीर देखिये जो कुछ दिन पहले अखबार में छपी थी.

Thursday, August 07, 2008

रेल में मौत के लिए कौन जिम्मेदार?

एक रेल के डिब्बों में आग लग गई और बहुत से निर्दोष नागरिक मारे गए. कौन जिम्मेदार है इसके लिए? दिल्ली के उपहार सिनेमा में लगी आग पर अदालत ने जो निर्णय दिया है, उसके अनुसार रेल मंत्री लालू प्रसाद दोषी हैं. उन पर उपहार के मालिकों की तरह मुकदमा चलना चाहिए.

यह रेल दुर्घटना दोनों टाली जा सकती थी. यात्रियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनियां आज कल अन्तर-राष्ट्रिय मानकों के अनुसार मेनेजमेंट सिस्टम्स लगाती हैं. रेल मंत्रालय को यह सिस्टम्स अपने यहाँ लगाने आवश्यक थे,पर उन्होंने नहीं लगाए. इन सिस्टम्स को लगाने का निर्णय कंपनी के प्रमुख द्बारा लिया जाता है. रेल कम्पनी के प्रमुख लालू प्रसाद हैं. इस सिस्टम में, रेल यात्रा के दौरान जितनी भी संभावित रिस्क हो सकती हैं उनका आंकलन किया जाता है और फ़िर उन्हें दूर करने के उपाय किए जाते हैं. इस मानक का नंबर है OHSAS 18001.

लालू प्रसाद ने अगर अपनी रेल में यदि यह सिस्टम लगाया गया होता तो रेल स्टाफ और यात्रियों को इस की पूरी जानकारी दी गई होती और उन्हें किसी भी इमरजेंसी में कैसे और क्या करना है इस के लिए भी ट्रेनिंग दी गई होती. पूरी सम्भावना थी कि इस के कारण यह दुर्घटना होने से बच जाती, और बच जाती नागरिकों की जान और राष्ट्र की संपत्ति.

रेल मंत्रालय / रेल मंत्री ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की और इतने निर्दोष यात्रिओं की जान गई. अब इन्हें कोई सजा दे पायेगा इस में तो पूरा संदेह है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि सरकार और बाबुओं को तो अब भगवान् भी ठीक नहीं कर सकते.

Monday, August 04, 2008

गैस सिलिंडर छीनने की धमकी

कल अखबार में पढ़ा कि जिन घरों में गैस पाईपलाइन से गैस मिलेगी उन्हें गैस सिलिंडर कनेक्शन वापिस लौटाने होंगे. यह तो फ़िर परेशानी की बात हो गई. सिलिंडर की काला बाजारी ने हमें हमेशा परेशान किया. सिलिंडर मिलने में हमेशा देर होती रही है. डबल सिलिंडर का एक गैस कनेक्शन है हमारे पास. परिवार बड़ा हो गया है. गैस की खपत बढ़ गई है. अक्सर २१ दिन नहीं चल पाता सिलिंडर. बहुत परेशानी होती है.

जब हमारे अपार्टमेंट्स में पाइप से गैस मिलने की बात हुई तो हमने तुंरत रजिस्टर करा लिया. सोचा चलो यह परेशानी अब ख़त्म हो जायेगी. पर अभी गैस मिलनी शुरू नहीं हुई कि यह धमकी दे डाली सरकार ने. लगता है यह सरकार ईमानदार नागरिकों को चैन से न रहने देने की कसम उठा चुकी है. हम सोच रहे थे कि जब कभी पाइप की गैस में कोई दिक्कत होगी तो एक रिजर्व में रखा सिलिंडर काम आएगा. पर अगर दोनों सिलिंडर वापिस करने पड़े तो परेशानी फ़िर बैसी की बैसी रही.

जो लोग गैस ब्लेक में ले लेते हैं, जिन्होनें झूट बोल कर एक से ज्यादा कनेक्शन ले रखे हैं, उन्हें न पहले कोई परेशानी थी और न अब होगी. परेशान होंगे तो केवल हम जैसे ईमानदार शहरी. सरकार भी उन्हीं के साथ है. बेईमान-बेईमान भाई-भाई. जो सरकार ख़ुद ही बेईमानी से विश्वासमत जीतती है उस से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह ईमानदार नागरिकों की चिंता करेगी?

Monday, July 14, 2008

शताब्दी ट्रेन में खाने में क्राक्रोच

मैंने अपनी पिछली पोस्ट 'मजबूरी का नाम है लालू' में रेलों में सर्व किए जाने वाले ठंडे वेस्वाद खाने की बात की थी. आज अखबार में पढ़ा कि अमृतसर शताब्दी में खाने पर क्राक्रोच रेंगते पाये गए. जिस यात्री के साथ ऐसा हुआ उसने वेटर से शिकायत की. वेटर ने बहस शुरू कर दी. इतने में कुछ और यात्रियों के खाने में भी क्राक्रोच मिले. अब वेटर बेचारा फंस गया. उसे यात्रियों से माफ़ी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा. खाना बदल कर दूसरा दिया गया, पर उस में भी छोटे-छोटे कीड़े रेंगते पाये गए.

लालू जी की रेल का ट्रेड मार्क अब बदलना चाहिए - "ठंडा वेस्वाद कीड़े वाला खाना".

मजा यह रहा की केटरर की वकालत की गई. यह कहा गया कि केटरर द्बारा सप्लाई किए गए खाने में कीड़े नहीं थे. कीड़े ट्रे में थे. यात्री यह नहीं समझ पा रहे थे और सोच रहे थे कि ट्रे क्या वह अपने साथ लाये थे? अरे भाई ट्रे भी तो केटरर की ही थी. लेकिन बात सोचने की यह है कि रेल वाले केटरर की वकालत क्यों कर रहे थे? एक यात्री के अनुसार एक शताब्दी ट्रेन में केटरिंग का कांट्रेक्ट लेने के लिए एक करोड़ रिश्वत देनी पड़ती है. अब एक करोड़ खा कर रेल वालों को केटरर की वकालत तो करनी ही पड़ेगी.

लालू जी की रेल में यात्रा करने वालों से निवेदन है की वह सफर के दौरान खाने के लिए घर से खाना लायें. शताब्दी और राजधानी ट्रेन्स में यात्रियों से पूछा जाए ओर उन्हीं यात्रियों से खाने का पैसा लिया जाए जो लालू जी द्बारा सप्लाई किया खाना खाना चाहते हैं. जो यात्री अपना खाना घर से लायेंगे उनसे खाने का पैसा न लिया जाए.

Tuesday, July 08, 2008

मजबूरी का नाम है लालू

मैं अक्सर लालू जी की रेल में सफर करता हूँ. शताब्दी एक्सप्रेस में आपसे टिकट के साथ ही खाने का पैसा भी ले लिया जाता है. ऐसा सिर्फ़ लालू जी की रेल में होता है. आप किसी होटल या रेस्तौरेंट में जाइए, पहले आप अपनी पसंद के खाने का ऑर्डर देते हैं, खाना खाते है और फ़िर पेमेंट करते हैं. लालू जी की रेल में आपकी पसंद का कोई ख्याल नहीं किया जाता. कब सर्व होगा और कैसे सर्व होगा, यह सब लालू जी की मर्जी है. खाने में क्या सर्व होगा यह भी लालू जी तय करते हैं. अब आपको यह ही खाना खाना पड़ेगा. रेल से बाहर जा नहीं सकते. आप यह भी नहीं कह सकते कि भई में अपना खाना ख़ुद ले आऊंगा, आप मुझसे लालू जी के द्बारा सर्व किये खाने का पैसा मत लीजिये.

"ठंडा वेस्वाद खाना" लालू जी की रेल का ट्रेड मार्क है. यह खाना न देखने में अच्छा है और न खाने में. इसकी पेकिंग भी बहुत घटिया होती है. जिस तरह से यह आपको सर्व किया जाता है वह भी बहुत ही घटिया है. रेल के वेटर इस तरह सर्व करते हैं जैसे सोच रहे हों कि कहाँ फंस गए और किसी तरह यह काम ख़तम हो तो जान छूटे. मैंने बहुत से सहयात्रियों से इस बारे में बात की है. लगभग सभी का यह कहना है कि भूख लगी होती है और कुछ दूसरी चीज खाने को होती नहीं, इस लिए इस ठंडे वेस्वाद खाने को गले से उतार कर पेट भरते हैं. क्या करें मजबूरी है, और मजबूरी का नाम है, लालू.

बहुत से यात्री लालू जी का खाना नहीं खाते. बस आइसक्रीम से काम चलाते हैं. उन का कहना है, भले ही देर से खाएं घर का खाना ही खाएँगे. एक बार मैंने अपने सहयात्री से पूछा कि आप ने खाने को मना क्यों कर दिया, उन्होंने मुझे घूर कर देखा, फ़िर मेरी खाने की ट्रे को देखा, फ़िर मेरे ऊपर एक दया भरी द्रष्टि डालते हुए कहा, "बीमार पड़ना है क्या?". मैं बीमार तो नहीं पड़ा पर लालू जी का खाना खाने के बाद मन काफ़ी देर तक अजीब सा रहता है. एक बार ऐसा हुआ कि एक बच्चे को उलटी हो गई थी. उसने अपने पापा के बहुत मना करने पर भी लालू जी का दही खा लिया था.

कल ही मैंने यह ठंडा वेस्वाद खाना खाया था. मन अजीब सा हो गया था. घर पहुँचा तो पत्नी ने कहा घर से कुछ ले जाया करो, क्यों बीमार पड़ने पर तुले हुए हो? सोचता हूँ पत्नी की बात मान लूँ. इस ब्लाग के माध्यम से लालू जी से छमा चाहूँगा. लालू जी अब और आपका खाना नहीं खा पाऊँगा, भले ही आप उसके पैसे मेरी जेब से निकालते रहें.

Sunday, July 06, 2008

लालू जी की रेल - अघोषित घोषणाऐं

लालू जी अक्सर घोषणाऐं करते हैं, बजट के दौरान, हार पहनने के वाद, फीते काटने के वाद. इस के अलावा स्टेशन पर भी बहुत सी घोषणाऐं होती हैं. पर कुछ घोषणाऐं ऐसी हैं जो कभी नहीं होतीं. यह घोषणाऐं ऐसी हैं जिनसे रेल के असली हालत पता चलते हैं. अब लालू जी तो यह घोषणाऐं करने वाले हैं नहीं, तो मैंने सोचा कि में ही क्यों न यह घोषणाऐं कर डालूँ.

"अगर आप किसी जरूरी काम से यात्रा कर रहे है और समय की भी पाबंदी है तब हमारी रेल से यात्रा न करें. अगर कोई रेल समय से पहुँच जाती है तब यह ईश्वर की इच्छा है. समय का हमारी रेल में कोई महत्त्व नहीं है. हम देरी के लिए खेद प्रकट करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते."

"अगर आपको सादा, स्वच्छ, स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना खाने की आदत है तब अपना खाना ख़ुद लायें. यात्रा के दौरान अगर आपने स्टशन या रेल में आईआरसीटीसी द्बारा सप्लाई किया गया खाना खाया और बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपको सुबह घूमने की आदत है और स्वच्छ हवा अपने फेफड़ों में भरने का नशा है तब स्टेशन पर बने प्रतीक्षालयों में न जाएँ. बहाँ के अशुद्ध वातावरण में अगर आप बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपकी रेल किसी स्टशन पर रुकी है तब खिड़की से बाहर न झांकें. साथ की पटरियों पर गन्दगी और कूड़ा-करकट देख कर अगर आपकी तबियत ख़राब हो गई तब इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"रेल का बहुत सा पैसा जुर्माने से बसूल होता है. इसलिए बिना टिकट या ग़लत टिकट के साथ यात्रा करें और जुर्माना भरें. ऐसा करके आप अपना राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा करेंगे रेल को फायदा होगा और हमारे मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"समय से टिकट खरीदना कोई अच्छी आदत नहीं है. तत्काल सेवा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. इस से आपकी जेब हलकी होगी, रेल की जेब भरेगी, मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"अगर आपको दिल्ली से आगरा जाना है और वापस आना है तब वापसी का टिकट दिल्ली में खरीदें. जाने का टिकट आगरा के किसी ट्रेवल एजेंट द्बारा खरीदें. इससे हर टिकट पर हमारी रेल को १५ रुपए ज्यादा मिलेंगे. रेल फायदे में जायेगी. मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे. ऐसा सब यात्राओं में करके अपनी राष्ट्रभक्ति का सबूत दें."

"रेल सेवाओं में कमी और गड़बड़ की शिकायत करना अच्छी आदत नहीं है. यह बिना मतलब की शिकायतें करके आप मंत्री जी और उनके सहयोगिओं को परेशान करते हैं. हमारी रेल में शिकायत सुनने और उस पर कार्यवाही करने का कोई प्रावधान नहीं है. शिकायत करके अपना और हमारा समय नष्ट न करें."

"रेल सुरक्षा बल आपकी सुरक्षा के लिए नहीं है. यह आपसे रेल को कोई नुक्सान न पहुंचे यह देखने के लिए है. अगर कोई सुरक्षा कर्मचारी आपकी वजह से परेशान हुआ तो आपके ख़िलाफ़ कार्यवाही की जायेगी."

"हमारी रेल में आप अपनी जिम्मेदारी पर सफर करते हैं. समान की चोरी, आपकी अपनी टूट-फूट और किसी भी नुकसान के लिए आप ख़ुद जिम्मेदार हैं. आप अपनी मर्जी से रेल में यात्रा करते. हम आपको यात्रा करने के लिए बुलाने नहीं जाते."

"हम अक्सर ऐसा कहते हैं - 'रेल आपकी संपत्ति है'. इसे सच न मान लें. रेल हमारे मंत्री जी और उनके परिवार, सम्बन्धियों, मित्रों और अन्य राजनेताओं की व्यक्तिगत संपत्ति है. आप उस में इस लिए सफर करते हैं कि रेल को फायदा हो. आपकी सुविधा के लिए हम रेल नहीं चलाते."

Saturday, June 21, 2008

मनमोहन जी द्बारा मुद्रास्फीति का नया रिकार्ड

पिछली बार जब मनमोहन जी ने मुद्रास्फीति की दर का रिकार्ड बनाया था तब वह वित्त मंत्री थे। इस बार वह प्रधान मंत्री हें। आज की ख़बरों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर ११.०५ प्रतिशत हो गई है। लगता है उन का और मुद्रास्फीति का कोई अटूट रिश्ता है।

पिछली बार यह कारनामा कांग्रेस सरकार के आखिरी साल में हुआ था, और चुनाव में सरकार हार गई थी। इस बार भी यह कारनामा सरकार के आखिरी साल में हुआ है। क्या इस बार भी कांग्रेस चुनाव हारेगी? मेरे विचार में हारना चाहिए। आग लगा दी है इस मंहगाई ने। मेरे जैसे पेंशन याफ्ता लोग क्या करें? कल जो सब्जी १६ रूपया किलो थी आज वह २० रुपया किलो है। एक न टूटने वाला चक्कर बन गया है। पहले बाज़ार में कीमतें बढ़ती हें। फ़िर उस से मंहगाई बढ़ती है। अखबार में बढ़ती मंहगाई की ख़बर से दुकानदार कीमतें और बढ़ा देते हें। कोंई कंट्रोल नहीं है इस सरकार का मंहगाई पर। सिवाय प्रदेश सरकारों को दोष देने के यह सरकार कुछ नहीं कर सकती। आम आदमी की सरकार आम आदमियों को निगल रही है।

एक भी तो कायदे का काम नहीं कर पाई यह सरकार। सारा समय मनमोहन जी अल्पसंख्यकवाद का राग अलापते रहे। इस सरकार के सारे फैसलों ने मंहगाई को ही बढ़ाया। वोट के चक्कर में जनता का पैसा इधर-उधर की तुष्टिकरण की योजनाओं में बरबाद करती रही यह सरकार। और तकलीफ की बात यह है की जिनके लिए यह किया गया उन्हें कोंई फायदा नहीं पहुँचा।

एक वरिष्ट नागरिक के दिल के दर्द है यह।

Thursday, June 19, 2008

अरे भाई इन्हें सजा क्यों नहीं देते?

एक ख़बर के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड ने चितरंजन पार्क के 'जी' ब्लाक में सड़क पर एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा. गड्ढा इतना बड़ा है कि लोगों के घर के दरवाजे तक पहुँच रहा है. जितनी तेजी से उन्होंने यह गड्ढा खोदा उस से ज्यादा तेजी से वह गड्ढे को ऐसा ही छोड़कर भाग गए. अब बारिश का मौसम समाप्त होने तक यह गड्ढा ऐसा ही रहेगा.

जो हुआ उस में कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं. दिल्ली की सिविक एजेंसीज इस सब के लिए हमेशा से मशहूर हैं. सच पूछिए तो पूरी दिल्ली सरकार ही गड्ढे खोद रही है और खुदवा रही है. दिल्ली में कहीं भी चले जाइए आपको गड्ढे ही गड्ढे नजर आयेंगे (मनमोहन जी की हरी-भरी, साफ़-सुथरी और अति सुंदर दिल्ली को छोड़कर).

चितरंजन पार्क के निवासी हर समय खतरे में हैं. किसी भी समय कोई भी गड्ढे में गिर सकता है. गड्ढे के चारों तरफ़ कोई बाढ़ नहीं हैं, न कोई खतरे से आगाह करने का कोई बोर्ड है. खुले पानी के पाइप्स, विजली और फोन के तार, कोई भी कभी भी उलझ कर गिर सकता है. पर किसे चिंता है? मनमोहन, शीला और जल बोर्ड के चीफ और अधिकारिओं के घर के आस पास गड्ढे नहीं खोदे जाते. अगर कोई गिरेगा तो कोई आम आदमी गिरेगा और आम आदमी की चिंता किसे है?

क्या यह संब अपराध नहीं है? इन लोगों को सजा क्यों नहीं दी जाती? क्या कानून सरकार और सरकारी बाबुओं के लिए नहीं है? दिल्ली जलबोर्ड वालों, डूब मरो शर्म से इस गड्ढे में.

Saturday, June 14, 2008

महंगाई का कोल्हू

लगता है मनमोहन को महंगाई बहुत मनमोहक लगती है.अर्थ का शास्त्र पढ़ा है न उन्होंने, इसलिए आम आदमी का तेल निकाल रहे हैं महंगाई के कोल्हू में. शायद यह भी सोच रहे हैं कि इस से तेल की कमी भी पूरी हो जायेगी.
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"जनता को सताने में बहुत मजा (sadistic pleasure) आता है डीडीऐ को", दिल्ली हाई कोर्ट.
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उनका चेक बाउंस हो गया, उन पर मुकदमा चला, वह अदालत में हाजिर नहीं हुए, अदालत ने कई सम्मन भेजे. पर वह फ़िर भी हाजिर नहीं हुए. अदालत ने दिल्ली पुलिस को खूब फटकारा और गैर-जमानती वारंट इशू कर दिया. पुलिस उनके घर आई उन्हें गिरफ्तार करने. अब उनका शव मुर्दाघर में है.
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"मेरे घर वाली गली में एक महीने से झाड़ू नहीं लगी",
"पिछले महीने हमारी नाली साफ हुई थी पर कीचड़ अभी भी हमारे दरवाजे पर पड़ी है:,
ऐसी सैकड़ों शिकायतें दिल्ली नगर निगम के पार्षद के पास आती हैं.
पार्षद जी ने बताया कि कोई सफाई कर्मचारी काम नहीं करता. उनके पीछे पड़ कर एक-एक शिकायत दूर करानी पड़ती है. सारा समय इसी में निकल जाता है.
हमने कहा, कहा, "फ़िर विकास का काम कब होगा?".
उन्होंने कहा, "अरे झाड़ू मारिये विकास को. अगर मैंने यह झाड़ू नहीं लगवाई तो अगले चुनाव में मेरे को झाड़ू लगा देंगे यह लोग".
हम पहुंचे सफाई कर्मचारियों के पास. उन्होंने कहा, "साहब, अगर सारा काम अपने आप हो जाए तो कोई तारीफ़ नहीं करता. अब शिकायत करेंगे तो देर सबेर काम हो ही जायेगा. जमता खुश होगी कि उसकी शिकायत पर कार्यवाही हुई. हमें भी कुछ चाय पानी का पैसा मिलेगा. पार्षद जी भी खुश होंगे और जनता से कह सकेंगे कि देखिये हम ने आप की शिकायतों पर कार्यवाही करवाई. उन्हें भी तो चुनाव जीतना है अगली बार".
हमने पूछा, "बाकी समय क्या करते हैं आप?".
उन्होंने कहा, "ताश खेलते हैं और गुर्जर आन्दोलन पर बहस करते हैं".
हम चुप रहे.
वह मुस्कुराए, "अरे जाने दीजिये न, सब खुश हैं. आप क्यों परेशान होते हैं? आप अपने घर का नंबर बताइये, वहाँ सफाई ठीक से करवा देंगे. आपको पार्षद जी को शिकायत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी".
हम वापस आने के लिए मुड़े.
तभी उन्होंने कहा. "साहब आप तो पढ़े-लिखे हैं. यह वसुंधरा सरकार आने वाले चुनाव में जीत पायेगी क्या? या गुर्जर इस सरकार को खा जायेंगे?".
हम मुस्कुरा दिए. एक खुशी भी हुई मन में. देखो हमारे सफाई कर्मचारी भी कितने सजग हैं प्रजातंत्र के लिए!