शताब्दी ट्रेन में खाने में क्राक्रोच
मैंने अपनी पिछली पोस्ट 'मजबूरी का नाम है लालू' में रेलों में सर्व किए जाने वाले ठंडे वेस्वाद खाने की बात की थी. आज अखबार में पढ़ा कि अमृतसर शताब्दी में खाने पर क्राक्रोच रेंगते पाये गए. जिस यात्री के साथ ऐसा हुआ उसने वेटर से शिकायत की. वेटर ने बहस शुरू कर दी. इतने में कुछ और यात्रियों के खाने में भी क्राक्रोच मिले. अब वेटर बेचारा फंस गया. उसे यात्रियों से माफ़ी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा. खाना बदल कर दूसरा दिया गया, पर उस में भी छोटे-छोटे कीड़े रेंगते पाये गए.
लालू जी की रेल का ट्रेड मार्क अब बदलना चाहिए - "ठंडा वेस्वाद कीड़े वाला खाना".
मजा यह रहा की केटरर की वकालत की गई. यह कहा गया कि केटरर द्बारा सप्लाई किए गए खाने में कीड़े नहीं थे. कीड़े ट्रे में थे. यात्री यह नहीं समझ पा रहे थे और सोच रहे थे कि ट्रे क्या वह अपने साथ लाये थे? अरे भाई ट्रे भी तो केटरर की ही थी. लेकिन बात सोचने की यह है कि रेल वाले केटरर की वकालत क्यों कर रहे थे? एक यात्री के अनुसार एक शताब्दी ट्रेन में केटरिंग का कांट्रेक्ट लेने के लिए एक करोड़ रिश्वत देनी पड़ती है. अब एक करोड़ खा कर रेल वालों को केटरर की वकालत तो करनी ही पड़ेगी.
लालू जी की रेल में यात्रा करने वालों से निवेदन है की वह सफर के दौरान खाने के लिए घर से खाना लायें. शताब्दी और राजधानी ट्रेन्स में यात्रियों से पूछा जाए ओर उन्हीं यात्रियों से खाने का पैसा लिया जाए जो लालू जी द्बारा सप्लाई किया खाना खाना चाहते हैं. जो यात्री अपना खाना घर से लायेंगे उनसे खाने का पैसा न लिया जाए.



