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Monday, May 26, 2008
लालू जी और मेरी जेब
पहले में जब भी दिल्ली से आगरा या चंडीगढ़ जाता था, दिल्ली में ही जाने के और वापसी के टिकट खरीदता था. पर जब से लालू जी की मेहरबानी हुई वापसी के टिकट में १५ रुपए ज्यादा लगने लगे. रेंगती रेलों को सुपर फास्ट कह कर यात्रिओं की जेब हल्की करना पता नहीं कौन से मेनेजमेंट का मन्त्र है? तत्काल के नाम पर यात्रिओं की जम कर जेब काटी जा रही है. सुरक्षा और समय की पाबन्दी के नाम पर लालू जी और लालू जी की रेल जीरो हैं. रेल कब आएगी और कब जायगी, यह आ जाने और पहुँच जाने के बाद ही पता लगता है. यात्री सुरक्षित पहुँच जायेंगे इनके बारे में भी पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता.
रेल सेवाएं सरकार उपलब्द्ध कराती है. एक सरकारी महकमा होने के नाते रेल विभाग का मुख्य उद्देश्य एक बहुत अच्छे स्तर की सेवा प्रदान करना होना चाहिए, प्रोफिट कमाना नहीं होना चाहिए. रेलों को नो-प्रोफिट-नो-लोस के सिद्धांत पर चलाना चाहिए. पर लालू जी की रेल केवल फायदा कमाने के लिए चलती है. यात्रिओं को एक समय-बद्ध, सुरक्षित, आरामदायक सेवा मिले इस से लालू जी को कोई मतलब नहीं है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक पेनल बनाईं जिसको रेल प्लेटफार्म्स पर सप्लाई किए जा रहे खाद्य पदार्थों की क्वालिटी की जांच करके रिपोर्ट देने को कहा गया. तीन रेल स्टेशन, पुरानी और नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन इस जांच के लिए चुने गये. जांच के बाद एक पेनल सदस्य ने कहा कि आज के बाद में रेल द्वारा सप्लाई की गई कोई बस्तु न तो खा सकूंगा और न ही पी सकूंगा. किचिंस में चूहों और क्राक्रोचों कि भरमार थी. कोई भी सिस्टम नहीं था न कच्चा माल खरीदने और स्टोर करने का, खाना बनने का या सर्व करने का. कर्मचारिओं का कोई मेडिकल चेक अप नहीं होता था. ले दे कर जांच रिपोर्ट बहुत ही गड़बड़ थी. एक दिन इस के बारे में अखबार में ख़बर आई और तुरंत ही गायब हो गई. मीडिया ऐसे मौकों पर सरकार की बहुत मदद करता है. कोका कोला पर शोर मचाने वाले लालू जी के खाद्द्य और पेय पदार्थों के बारे में चुप रहे.
आई आर सी टी सी भारतीय रेलों में खाद्द्य और पेय पदार्थों की सप्लाई के लिए ठेके देता है. एक बार में कालका शताब्दी में सफर कर रहा था. जो खाना सर्व किया गया बहुत ही ख़राब था - ठंडा और बेजायका. पता नहीं ग़लत है या सच है - एक सज्जन ने मुझे बताया कि एक शताब्दी या राजधानी एक्सप्रेस में यह ठेका एक करोड़ की रिश्वत देने पर मिलता है. देहरादून और कालका शताब्दी का मेरा अनुभव मुझे इसे सच मानने को मजबूर करता है. दो बार मैंने शिकायत की पर कोई कार्यवाही नहीं की गई.
लालू जी की एक और देन है रेल यात्रियों को. अब यात्रियों की शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. मैंने ताज एक्सप्रेस में तीन बार टीटी द्वारा सप्लाई की गई शिकायत पुस्तिका में शिकायत लिखी पर कुछ नहीं हुआ. देहरादून शताब्दी, कालका शताब्दी, लखनऊ शताब्दी और श्रमजीवी एक्सप्रेस में लिखी शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.
अभी पिछले दिनों मैंने हावड़ा-एहमदाबाद एक्सप्रेस में यात्रा की. तत्काल में टिकट ख़रीदा. मुझे झरसागुडा तक जाना था पर एहमदाबाद तक टिकट खरीदना पड़ा. बहत तगड़ी जेब कटी. वापसी आजाद हिंद एक्सप्रेस से हुई. इसमें भी तत्काल से टिकट लिया. पर इस बार एहमदाबाद से नहीं, राजनांदगांव से किराया भरना पड़ा. यहाँ भी जेब कटी.
अब बात करें इन सुपरफास्ट एक्सप्रेस रेलों की समय पाबन्दी की. हावड़ा से रेल ११५५ पर छूटती है. पर उस रात यह रेल १२३० के बाद प्लेटफार्म पर आई. बहुत गर्मी थी उस रात. हालत ख़राब हो गई. करीब दो घंटा देर से झरसागुडा पहुँची. जिस मीटिंग के लिए मैं गया था वह दो घंटा देर से शुरू हो पाई. लालू जी के कारण लगभग ३५ लोगों को परेशानी हुई. वापसी में आजाद हिंद एक्सप्रेस दो घंटा लेट आई और हावड़ा पहुँचते पहुँचते चार घंटे से ज्यादा लेट हो गई. ०३५५ की जगह यह ०८३० के बाद हावड़ा पहुँची. मेरी दिल्ली की फ्लाईट ०८२० पर थी, वह छूट गई. किराया वापस नहीं हुआ. दूसरी फ्लाईट में टिकट लेना पड़ा. लालू जी की मेहरबानी से ४५०० रुपए का चूना लगा और देर से घर पहुँचा सो अलग.
लालू जी की आज कल बहुत तारीफ़ हो रही है. उन्होंने घाटे में चल रही रेल को फायदे में ला दिया. मेनेजमेंट वाले उन्हें हार पहना रहे हैं. पर मेरे व्यक्तिगत अनुभव से भारतीय रेल एक बहुत ही घटिया रेल सेवा है. इस में यात्रियों के लिए कुछ नहीं है. काश भारत में एक रेल सेवा और होती. कोई तो विकल्प होता यात्रियों के सामने. आपने जाना है तो लालू जी की रेल ही लेनी होगी. जेब कटवा कर देर से पहुचंगे.
Tuesday, May 13, 2008
क्या निजीकरण जनताकरण नहीं है?
हम ग़लत थे. निजीकरण का मतलब जनताकरण नहीं होता. विजली 'जब चाहे चली जाए' वाली बात अब् भी है. विजली की कीमत मर्जी से अब् भी बढ़ा दी जाती है. कोई सुधार नहीं हुआ. सब कुछ बैसे का बैसा है. अन्तर है सिर्फ़ शीला दीक्षित के लिए. अब् वह सारी जिम्मेदारी निजी कम्पनियों पर डाल सकती हैं. जनता की नजरों में अच्छा बनने के लिए निजी कम्पनियों को डांट लगा सकती हैं. उनके घर में विजली कभी नहीं जाती. दिल्ली का वी आई पी एरिया विजली कटौती की चपेट में न पहले था और न अब् है. पहले भी आम आदमी ही तंग था और आज भी आम आदमी ही तंग है.
सरकारी निजीकरण मुर्दाबाद. जनता को जनताकरण चाहिए.
शिकायत करो और भाड़ में जाओ
आपका शिकायत करना जायज है. संविधान ने आपको शिकायत करने का पूरा अधिकार भी दिया है. पर आप दूसरों के उस अधिकार को नजरअंदाज नहीं कर सकते, जिस के अंतर्गत वह यह सब कर सकते हैं. यह अधिकार आता है उस सोच से जो कहता है - 'अरे यार यहाँ सब चलता है'. इस सोच के आगे संविधान भी हाथ खड़े कर देता है.
बहुत से संस्थान शिकायत सुन तो लेते हैं, पर कुछ करते नहीं. कुछ बड़े सेवा संस्थान शिकायत को शिकायत न मानकर सुझाव के रूप में दर्ज कर लेते हैं और बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारे यहाँ कोई शिकायत नहीं आती. कुछ और बड़े सेवा संस्थान शिकायतों से निपटने के लिए कम्पूटर लगा देते हैं. आप शिकायत करते हैं और यह कम्पूटर उसे एक नंबर दे देता है और कुछ समय बाद बंद कर देता है. कोई एक्शन न होने पर आप फ़िर शिकायत करते हैं या पहली शिकायत का रिमाइंडर देते हैं. यह कम्पूटर फ़िर एक नया नंबर दे देता है और कुछ समय बाद उसे बंद कर देता है. यह सिलसिला चलता रहता है और कुछ समय बाद आप थक कर शिकायत करना बंद कर देते हैं. कुछ संस्थान अपने और आपके बीच में काल सेंटर खड़ा कर देते हैं और मस्ती की नींद सोते हैं. आप निपटते रहिये काल सेंटर वालों से. पुलिस की बात करें तो वह शिकायत दर्ज करने से बचने में एक्सपर्ट हैं. अक्सर पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के लिए अदालत में जाना पड़ता है.
आम तौर पर जनता को सरकार से शिकायत होती है. पर अब सरकार भी जनता की शिकायत करती है. पिछले दिनों दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली के कुछ लोगों की शिकायत की थी. हल्ला मच गया तो शिकायत को सुझाव कह दिया गया. नेता लोग तो हमेशा ही दूसरे नेताओं और पार्टियों की शिकायत करते रहते हैं. इन शिकायतों का कोई अर्थ नहीं होता, बस वह राजधर्म का पालन करने के लिए की जाती हैं.
दूसरी तरफ़ कुछ लोग आपके सुझाव को शिकायत मान लेते हैं और बुरा मान जाते हैं. अगर आपने कुछ ज्यादा सुझाव दे दिए तो आप के बारे में यह कहा जाने लगता है कि, 'यार यह आदमी हर समय शिकायत ही करता रहता है'. आप लाख कहें कि मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ पर कोई आपकी बात नहीं सुनता.
सबसे मजेदार बात यह है की लोग सिर्फ़ दूसरों की शिकायत करते हैं. ख़ुद की शिकायत कोई नहीं करता. अगर आप ईमानदारी से किसी मसले को देखें तो पाएंगे कि उसमें शिकायत तो आपके ख़ुद के ख़िलाफ़ बनती है. क्या आपने कभी अपने ख़िलाफ़ शिकायत की है? यदि नहीं तो करके देखिये. कुछ नया ही अनुभव मिलेगा.
एक कहावत है - "शिकायत करो और भाड़ में जाओ". क्या कहा, आपने नहीं सुनी आज तक यह कहावत? अरे भाई सुनेंगे कहाँ से. अभी अभी तो लिखी है मैंने. बैसे एक बात बताइये, क्या आप ख़ुद नहीं कहते हें, शिकायत करो और भाड़ में जाओ?
Monday, May 12, 2008
लालूजी की रेलों में सफाई प्रतियोगता
आपको शायद याद हो, कुछ वर्ष पहले लालूजी ने बजट भाषण के दौरान प्लेटफार्मों पर सफाई प्रतियोगता का एलान किया था. जो प्लेटफोर्म साफ पाए जाएँगे उन्हें पुरूस्कार मिलेगा. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. अगले वर्षं के बजटों में इस का कोई जिक्र भी नहीं किया उन्होंने. शायद बजट भाषण के बाद उन्होंने सफाई प्रतियोगता को गंदगी प्रतियोगता के रूप में बदल दिया. शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेंस में नए डिब्बे लगे हैं, पर शौचालय गंदे रहते हैं. तरल साबुन की जगह सादा पानी भर दिया जाता है. पूरी यात्रा के दौरान कोई सफाई कर्मचारी नजर नहीं आता.
लालूजी बातें बहुत करते हैं. उनकी तारीफ़ भी बहुत की जाती है कि उन्होंने रेल का कायाकल्प कर दिया है. पर में जब भी सफर करता हूँ मुझे सामान्य सफाई भी नजर नहीं आती. गंदे डिब्बे, गंदे शौचालय, गंदे प्लेटफार्म, रेल लाइनों पर गंदगी, यह लालूजी का रेल ब्रांड है.
समय की पाबन्दी!! यह क्या चीज है?
आज के अखबार में एक समाचार है - लालूजी सिंगापुर जाकर वहाँ के मैनेजमेंट स्टूडेंट्स को भारतीय रेल की महान सफलताओं के बारे में बतायेंगें. लेकिन रेलों के देर से चलने से देश को कितनी आर्थिक हानि हुई है इसका जिक्र वह नहीं करेंगे. जितना फायदा लालूजी दिखायेंगे वह उस नुकसान से बहुत कम होगा जो उन्होंने देश को पहुँचाया है. अगर हम उनसे इस बारे में बात करें तो मुझे विश्वास है कि उनका जवाब होगा - ""यदि आप समय पर अपने गंतव्य पर पहुँचना चाहते हैं तब भारतीय रेल से यात्रा न करें. समय की हमारे लिए कोई कीमत नहीं है".
पिछले सप्ताह मैं उड़ीसा में झरसागुडा गया था. दिल्ली से कोलकाता तक हवाई यात्रा और वहाँ से रेल. हावड़ा-अहमदाबाद एक्सप्रेस का छूटने का समय है ११.५५, पर यह ट्रेन १२.३० पर पलेटफ़ामॅ पर लगाई गई. गर्मी से बुरा हाल हो गया. आधा घंटा ट्रेन लेट चली और दो घंटा देर से पहुँची. जिस कार्य के लिए मैं गया था वह देर से शुरू हो पाया. इक्कीस लोग मेरे देर से पहुँचने से परेशान हुए. और इस सबके लिए कौन जिम्मेदार था, लालूजी और उनका मंत्रालय.
वापसी में मेरा रिज़र्वेशन आज़ाद हिंद एक्सप्रेस में था. यह ट्रेन लगभग दो घंटा बिलंब से आई. रास्ते में और बिलंब हुआ और यह ट्रेन ०८.३२ पर हावड़ा पहुँची. इसका सही समय है ०३५०. कोलकाता से मुझे ०८.२० की फ्लाईट लेनी थी पर वह मिस हो गई. टिकट बेकार गया. ११.३५ की फ्लाईट से नया टिकट लेना पड़ा. लालूजी के कारण मुझे ४५०० रुपए का नुकसान हुआ. देर से दिल्ली पहुँचा. घर वाले बहुत परेशान हुए. देवी माँ की कृपा से अगली फ्लाईट में जगह मिल गई वरना न जाने कितनी परेशानी उठानी पड़ती. इस सबके लिए कौन जिम्मेदार था, लालूजी और उनका मंत्रालय. पर लालूजी को तो हार पहनाये जा रहे हैं.
किसे चिंता है ग्राहक की?
Saturday, March 15, 2008
शुद्ध जल पूर्ति का जन अधिकार
दिल्ली जल बोर्ड की जिम्मेद्दारी है दिल्ली निवासिओं को सुरक्षित और पूरी मात्रा मैं पीने योग्य जल सप्लाई करना. इस काम मैं बोर्ड हमेशा नाकामयाब रहा है. अभी केंद्रीय सरकार ने भी माना है की दिल्ली मैं सप्लाई किया जा रहा पानी सब-स्टैंडर्ड है. लेकिन एक सरकारी मंत्री के अनुसार सरकार के पास पानी पर टैक्स लगाने के अलाबा पानी की गुणवत्ता सुधारने की या तो कोई काबलियत नहीं है या उस का ऐसा कोई इरादा नहीं है. दिल्ली की मुख्य मंत्री को तो अखवार मैं अपने फोटो छपबाने से ही फुरसत नहीं मिलती. आज के अखबार मैं भी, जनता के पैसे से छपबाये गए, कई ऐसे विज्ञापन हैं जिन मैं उनका फोटो छापा गया है.
भारतीय मानक ब्यूरो ने सुरक्षित पीने योग्य पानी का मानक बना रखा है पर दिल्ली जल बोर्ड मैं समय-समय पर शायद पानी की टेस्टिंग करबाने का कोई सिस्टम नहीं है. इस मानक का नुम्बर है - आई एस १०५०० - और इस मानक मैं पानी के बहुत सारे टेस्ट दिए गए हैं. यदि इस मानक के अनुसार पानी समय-समय पर टेस्ट करबाया जाए और कोई कमी पाए जाने पर उचित कार्यवाही की जाए तब दिल्ली के निवासी शुद्ध पानी पी सकेंगे और अनेक वीमारिओं से छुटकारा पा सकेंगे.
१५ मार्च, विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस वर्ष भी मनाया गया। सरकार ने विज्ञापन छापे और अपने कर्तव्य की इतिश्री की। क्या दिल्ली जल बोर्ड और दिल्ली सरकार अपने उपभोक्ताओं के शुद्ध जल की आपूर्ति के अधिकार का हनन बंद करेगी?
Thursday, March 13, 2008
Safety in hospitals
People go to hospitals to get well. If they get well then their good luck should get more credit than the efforts of doctors and hospital administration & staff. We have been hearing stories about wrong treatment and delayed treatment.But now there are news about safety also. A prematurely-born five day old girl was charred to death as the warmer, in which she was being treated for jaundice, was not safe. I short circuit in the warmer sparked a fire. This bizarre incident happened in Bhagwan Mahavir Hospital in Pitampura in New Delhi on Wednesday. The hospital is run by Delhi Government, whose CM and Health Minister keep busy in getting their photos published in advertisements financed by public money.
Timely warnings by the mother of the girl were not taken seriously by the staff. Even after they rushed to the scene, they did not try to save he girl, but were only busy in dowsing the fire. Lack of safety in appliances used in the hospitals has become a cause for a death.
Another death due to short circuit in phototherapy machine was caused in Shardaben General Hospital in Ahmedabad, where a three year old baby was being treated.
Tuesday, March 11, 2008
Is Prime Minister a customer?
I wonder whether Prime Minister also faces these problems. Is he a customer like me and suffers like me? Or service providers consider serving him a privilege? Is Sonia Gandhi or any other VIP treated like an ordinary customer and made to suffer like me?
It is said that India is a democracy. It is also said that in a democracy all are equal. But it is not true in Indian democracy. Will a day come in Indian democracy, when Prime Minister will also suffer due to long power & water cuts like me?
Tuesday, January 01, 2008
Bring love back in our lives

In 2007 we have seen love loosing to hate, peace loosing to violence. We should stop and ponder. Are we going to allow this to continue or we should do something to reverse the trend?
If we want that in year 2008, love should emerge victorious over hate and peace over violence then we need to bring love back in to our lives. My friends wonder where the love has gone. I wonder too. Has love really gone out of our lives or it is still there within our hearts but has been covered by greed which brought hate and violence to the front? Whatever is the situaion we should re-discover love. Without love we cease to be human beings.
Every year people make new resolutions. I also do. Last year I made a resolution to develop positive attitude towards life and people. I succeeded to some extent. I continue with this resolution for year 2008 also.
This year I make a new resolution to bring love back in our lives. Let love be victorious on hate. Let peace be victorious on violence.
I have many wishes too (list is very long. Here are some):
No deaths under blue line buses.
No killings of senior citizens.
No child abuse.
No violence against women.
No road rage.
No police brutality on innocent citizens.
No exploitation of and discrimination against any citizen.
No customer harassment.
No terror killings.
No photos of ministers on public ads.
HAPPY NEW YEAR TO ALL.