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India Against Corruption - A Jan Lokpal Bill has been designed which has strong measures to bring all corrupt people to book. Join the cause and fight to force politicians to implement this powerful bill as an act in the parliament.

Thursday, January 29, 2009

२५ देकर ५०० रुपए की जेब काट ली

सरकार ने कुकिंग गेस के सिलिंडर की कीमत में २५ रुपए की कमी कर दी. मीडिया वाले पगला गए, चिल्लाने लगे, आने वाले चुनाव से पहले तोहफा. जब सरकार कीमत बढाती है तब कोई नहीं कहता कि जेब काट ली. पर जब कीमत कम होती है तो उसे तोहफा कहा जाता है. जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें बढीं तो सरकार ने यहाँ कीमतें बढ़ा दीं. किसी ने कुछ नहीं कहा. पर जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतें कम हुईं तो सरकार महीनों तक केवल घोषणाएं करती रही, और जब बाकई में कीमतें कम हुईं तो उसे तोहफे का नाम दे दिया. हकीकत यह है की जितनी कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कम हुई हैं उसके अनुपात से यहाँ कीमतें कम नहीं की गई हैं.

किसी भी प्रजातांत्रिक सरकार के लिए यह शर्म की बात है. पर इस सरकार के लिए नहीं, क्योंकि यह सरकार प्रजातांत्रिक सरकार है ही नहीं. इसे राजतंत्र, नेतातंत्र, परिवारतंत्र, या फ़िर गुंडातंत्र की सरकार तो कहा जा सकता है, पर प्रजातांत्रिक सरकार कहना सत्य को झुटलाना होगा. एक नेता बाहर निकलता है तो इतना तेल फूंक देता है जो एक आम नागरिक पूरे साल में नहीं फूंकता होगा. और इस सारे तेल की कीमत जनता को चुकानी पड़ती है. जनता के पैसे से ऐयाशी करने वाले यह नेता, 'तेल कम्पनियों को घाटा हो रहा है' की दुहाई देते हैं. २५ रुपए कम करके कहते हैं जनता को तोहफा दिया है, जैसे यह पैसा इनका है, और यह चाहते हैं कि इस तोहफे के बदले में इन्हें फ़िर वोट दिया जाय.

२५ रुपए तो तब बचेंगे जब अगली बार सिलिंडर लेंगे, पर ५०० रुपए महीने की जेब तो कट गई पिछले सितम्बर से. स्कूलों की फीस बढ़ा दी. क्या पढाते हैं यह स्कूलों में? नीति, शिष्टाचार, नैतिकता या सिर्फ़ ज्ञान-वर्धन जो मात्र पैसा कमाने के लिए है. स्कूल जब ख़ुद पैसा कमाने की दुकाने बन गए हैं तो बच्चों को क्या सिखायेंगे? पैसा,पैसा और ज्यादा पैसा. ग़लत या सही किसी तरीके से भी. लोग स्कूलों को अपनी दूसरी जरूरतें काट कर फीस देते हैं और उनका बच्चा 'ज्यादा ग़लत' और 'कम सही' सीख कर आता है स्कूल से. मास्टर ज्यादा तनख्वाह मांगते हैं और बच्चों की पिटाई करते हैं. कुछ मास्टर तो अमानवीय कृत्य तक कर डालते हैं बच्चों के साथ.

क्या करे बेचारा आम आदमी?

Sunday, January 04, 2009

यह पैदल चलने वाले बेबकूफ

कल अखबार में पढ़ा कि सड़क पर हुए हादसों में होने वाली मौतों का अधिक प्रतिशत सड़क पर पैदल चलने वालों का होता है. पैदल चलते-चलते अचानक ही यह लोग कार (एम्बुलेंस) में बिठा दिए जाते हैं और जहाँ उन्हें जाना था, वहां न ले जा कार उन्हें अस्पताल ले जाती है. अस्पताल में, 'मृत आए' की पर्ची लगा दी जाती है, या कुछ दिन बाद यह लोग 'मृत पर्ची' के अधिकारी हो जाते हैं. 

बैसे अगर आप सरकार से पूँछें तो जवाब मिलेगा कि यह लोग सड़क पर क्यों चलते हैं? हमने पैदल चलने वालों के लिए फूटपाथ बनाए हैं, यह लोग फूटपाथ पर क्यों नहीं चलते. अब सरकार को यह कौन समझाए कि उस के बनाये फुटपाथ तो चोरी हो गए. लोगों ने फुटपाथ पर दुकाने सजा ली हैं. सरकारी बाबू, नगर निगम और पुलिस ने फुटपाथ दुकानदारों को बेच दिए हैं. साथ ही फुटपाथ से लगा सड़क का कुछ हिस्सा उन्हें बोनस में दे दिया है. पैदल चलने वाले को सड़क के बीच में चलना पड़ता है, और किसी समय भी बेचारा वर्तमान से भूतकाल हो जाता है. 

मेरे एक मित्र ने कहा कि सरकार को क्या समझाओगे? सरकार जहाँ रहती है वहां के फुटपाथ थोड़े ही चोरी हुए हैं. वहां के फूटपाथ तो यहाँ की सड़क से बहुत अच्छे हैं. भूल गए जब प्रधानमन्त्री ने मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाई थी और कहा था कि दिल्ली भारत का सबसे सुंदर शहर है. पुलिस कमिश्नर के अनुसार दिल्ली बहुत सुरक्षित है.  सरकार जिन लोगों के लिए है, वह सुंदर दिल्ली में रहते हैं और सुरक्षित हैं. दूसरे लोग तो साले बेबकूफ हैं कि रोज मरते हैं, पर सुबह उठ कर वोट इसी सरकार को दे आते हैं. इतनी सी बात इन बेबकूफों की समझ में नहीं आती कि सरकार उनकी नहीं होती जिनके वोटों से बनती है.  

Thursday, December 18, 2008

परदे के पीछे रेल बजट

रेल मंत्री रेल बजट बना रहे थे. उन्होंने सब अधिकारियों को एक बार फ़िर साबधान किया, 'किराए किसी हालत में बढ़ने नहीं चाहियें. किराए बढे और तुम सबकी नौकरी गई'. 
'मगर सर, अगर इस बार भी किराए नहीं बढ़ाए गए तो बजट घाटे में आ जायेगा', अधिकारियों ने कहा.
'कितने साल हो गए तुम लोगों को मेरे साथ काम करते हुए'. मंत्री जी झल्लाए, 'अभी तक यात्रिओं की जेब काटना नहीं सीखे. हर बार मैं ही तरकीबें बताता हूँ कि बिना किराया बढ़ाए फायेदा का बजट कैसे बनाते हैं?' 
एक चमचा अधिकारी बोले, 'सर, जब से आप आए हैं तबसे हर साल यात्रियों की जेब काटी जा रही है, और यह आप इस सफाई से करते हैं कि यात्री को पता ही नहीं चलता कि उस की जेब कट गई.'
'हाँ सर', दूसरे चमचे अधिकारी ने हाँ में हाँ मिलाई, 'यात्री तो आपकी तारीफ़ करते नहीं थकते कि आपने किराए नहीं बढाए, जबकि परदे के पीछे बेचारे की जेब कट गई'. 
तीसरा चमचा बोला, 'इसीलिए तो सारी दुनिया आपको हार पहनाती रही. यात्रियों की जेब काटकर आप मेनेजमेंट गुरु बन गए'. 
'बस बस ज्यादा चमचागिरी की जरूरत नहीं है', मंत्री जी नाटकीय अंदाज में मुस्कुराए, ''शाम को हमारे बंगले पर मिलना, कुछ फायदा कर देंगे तुम्हारा', कहते हुए मंत्री जी ने उन अधिकारियों को देखा जो चमचा बनना अपनी शान के ख़िलाफ़ मानते हैं.
'धन्यवाद श्रीमान जी', चमचे अधिकारी एक स्वर में बोले, 'इस बार भी हमारा मार्ग दर्शन कीजिए'. 
'जुर्माने की रकम बढ़ा दो', मंत्री जी ने ज्ञान बांटा, 'टिकट चेकरों को निर्देश दे दो कि यात्रियों को बिना टिकट यात्रा करने के लिए प्रोत्साहित करें. ट्रेन चलने पर बिना किसी दया के जुर्माना जम कर बसूल करें. तत्काल में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा दें, वेट लिस्ट सीटों की संख्या कम कर दें, मतलब यार्त्रियों को मजबूर करें कि वह तत्काल में आरक्षण करवाएं. जो बच गई हैं उन धीमी ट्रेनों को सुपर फास्ट घोषित कर दें. ट्रेनों के रख-रखाब पर हो रहे खर्चे को कम करें. जब तक ट्रेन खड़ी न हो जाए, उससे पहले उसकी सर्विस करना अनुशासनहीनता माना जाए. शिकायतों पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है'. इतना कह कर मंत्री जी हांपने लगे.  
चमचे मुस्कुराने लगे. जो चमचे नहीं थे वह बगलें झाँकने लगे.
'अब कुछ अपना दिमाग भी लगाओ', मंत्री जी उठते हुए बोले, 'चलता हूँ, जरा मेडम से मिलने जाना है, कन्फर्म करना कि इस साल भी किराए नहीं बढ़ेंगे'.  

Saturday, August 30, 2008

लालू की रेल, हो गई फेल

पिछले दिनों मुझे ताज एक्सप्रेस से आगरा जाने का अवसर मिला। मेरे पास में गुजरात के एक सज्जन बैठे थे जो अपने परिवार के साथ ताजमहल देखने जा रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वह वर्ष १९७५ में ताजमहल देखने आए थे और इसी ताज एक्सप्रेस में यात्रा की थी। उनकी बेटी अमरीका में रहती है और आजकल भारत आई हुई है। उसके बच्चे ताजमहल देखना चाहते हैं। आज वह उन्हें ताजमहल दिखाने ले जा रहे हैं। पिछली बार ताज एक्सप्रेस में उन्हें बहुत मजा आया था, इसलिए उन्होंने इस ट्रेन से ही आरक्षण करवाया। पर आज यह ट्रेन देख कर उन्हें बहुत निराशा हुई। ताजमहल के नाम पर जिस ट्रेन का नाम रखा गया हो, उस ट्रेन की ऐसी दयनीय स्थिति, कितनी शर्म की बात है। रेल मंत्री लालू प्रसाद की सारी दुनिया में तारीफ़ हो रही है कि उन्होंने भारतीय रेल को फायदे में ला दिया। ताज एक्सप्रेस को इतना गन्दा और घटिया करके यह जनाब हार पहनते फ़िर रहे हैं, शर्म आनी चाहिए इन्हें। यह सब सुन कर मैंने सोचा, लालू तुम्हारी रेल हो गई फेल।

कुछ देर बाद, उनकी बेटी के दोनों बच्चे उनके पास आए और बोले, 'नाना हम आपसे नाराज हैं। इतनी गन्दी ट्रेन है यह, और आप इस की तारीफ़ कर रहे थे। क्या ताज महल भी ऐसा ही होगा?' वह बेचारे चुप रहे। मैंने कहा, 'नहीं बच्चों ताज महल तो बहुत खूबसूरत है, तुम लोग देखोगे तो बहुत खुश हो जाओगे'। उन्होंने मेरी तरफ़ अविश्वास से देखा और अपनी सीट पर चले गए। मैंने मन में सोचा, ताजमहल तो बाकई बहुत सुंदर है और शायद इसलिए कि लालू ताजमहल को गन्दा नहीं कर पाये हैं।

जिन लालू की हर तरफ़ तारीफ़ होती है उन लालू की रेल को दो बच्चों ने कर दिया फेल

Sunday, August 24, 2008

दिल्ली के नागरिक आख़िर करें क्या?

मनमोहन जी का कहना है कि दिल्ली से ज्यादा हरा-भरा, साफ़-सुथरा और खूबसूरत शहर भारत में दूसरा नहीं है। मेरी राय इस बारे में बिल्कुल उलट है। में एक भुक्त भोगी हूँ और मनमोहन जी ने तो कभी कुछ भोगा ही नहीं। वह भारत के प्रधान मंत्री हें, इस लिए उनके बयान अखबारों में छपते हें। मैं एक आम नागरिक हूँ इस लिए मेरी कोई राय अखबार में नहीं छपती। भला हो ब्लाग्स का, कम से कम अपने ब्लाग पर तो अपनी बात कह लेता हूँ।

इस बार बात कुछ इतनी ज्यादा बिगड़ गई कि अखबार वालों को दिल्ली की सड़कों के ख़िलाफ़ मुहिम चलाना पड़ा। दिल्ली की सड़कों से ज्यादा ख़राब सड़कें शायद भारत में कहीं और नहीं होंगी। अगर यकीन न हो तो यह तस्वीर देखिये जो कुछ दिन पहले अखबार में छपी थी.

Thursday, August 07, 2008

रेल में मौत के लिए कौन जिम्मेदार?

एक रेल के डिब्बों में आग लग गई और बहुत से निर्दोष नागरिक मारे गए. कौन जिम्मेदार है इसके लिए? दिल्ली के उपहार सिनेमा में लगी आग पर अदालत ने जो निर्णय दिया है, उसके अनुसार रेल मंत्री लालू प्रसाद दोषी हैं. उन पर उपहार के मालिकों की तरह मुकदमा चलना चाहिए.

यह रेल दुर्घटना दोनों टाली जा सकती थी. यात्रियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कंपनियां आज कल अन्तर-राष्ट्रिय मानकों के अनुसार मेनेजमेंट सिस्टम्स लगाती हैं. रेल मंत्रालय को यह सिस्टम्स अपने यहाँ लगाने आवश्यक थे,पर उन्होंने नहीं लगाए. इन सिस्टम्स को लगाने का निर्णय कंपनी के प्रमुख द्बारा लिया जाता है. रेल कम्पनी के प्रमुख लालू प्रसाद हैं. इस सिस्टम में, रेल यात्रा के दौरान जितनी भी संभावित रिस्क हो सकती हैं उनका आंकलन किया जाता है और फ़िर उन्हें दूर करने के उपाय किए जाते हैं. इस मानक का नंबर है OHSAS 18001.

लालू प्रसाद ने अगर अपनी रेल में यदि यह सिस्टम लगाया गया होता तो रेल स्टाफ और यात्रियों को इस की पूरी जानकारी दी गई होती और उन्हें किसी भी इमरजेंसी में कैसे और क्या करना है इस के लिए भी ट्रेनिंग दी गई होती. पूरी सम्भावना थी कि इस के कारण यह दुर्घटना होने से बच जाती, और बच जाती नागरिकों की जान और राष्ट्र की संपत्ति.

रेल मंत्रालय / रेल मंत्री ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की और इतने निर्दोष यात्रिओं की जान गई. अब इन्हें कोई सजा दे पायेगा इस में तो पूरा संदेह है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि सरकार और बाबुओं को तो अब भगवान् भी ठीक नहीं कर सकते.

Monday, August 04, 2008

गैस सिलिंडर छीनने की धमकी

कल अखबार में पढ़ा कि जिन घरों में गैस पाईपलाइन से गैस मिलेगी उन्हें गैस सिलिंडर कनेक्शन वापिस लौटाने होंगे. यह तो फ़िर परेशानी की बात हो गई. सिलिंडर की काला बाजारी ने हमें हमेशा परेशान किया. सिलिंडर मिलने में हमेशा देर होती रही है. डबल सिलिंडर का एक गैस कनेक्शन है हमारे पास. परिवार बड़ा हो गया है. गैस की खपत बढ़ गई है. अक्सर २१ दिन नहीं चल पाता सिलिंडर. बहुत परेशानी होती है.

जब हमारे अपार्टमेंट्स में पाइप से गैस मिलने की बात हुई तो हमने तुंरत रजिस्टर करा लिया. सोचा चलो यह परेशानी अब ख़त्म हो जायेगी. पर अभी गैस मिलनी शुरू नहीं हुई कि यह धमकी दे डाली सरकार ने. लगता है यह सरकार ईमानदार नागरिकों को चैन से न रहने देने की कसम उठा चुकी है. हम सोच रहे थे कि जब कभी पाइप की गैस में कोई दिक्कत होगी तो एक रिजर्व में रखा सिलिंडर काम आएगा. पर अगर दोनों सिलिंडर वापिस करने पड़े तो परेशानी फ़िर बैसी की बैसी रही.

जो लोग गैस ब्लेक में ले लेते हैं, जिन्होनें झूट बोल कर एक से ज्यादा कनेक्शन ले रखे हैं, उन्हें न पहले कोई परेशानी थी और न अब होगी. परेशान होंगे तो केवल हम जैसे ईमानदार शहरी. सरकार भी उन्हीं के साथ है. बेईमान-बेईमान भाई-भाई. जो सरकार ख़ुद ही बेईमानी से विश्वासमत जीतती है उस से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह ईमानदार नागरिकों की चिंता करेगी?

Monday, July 14, 2008

शताब्दी ट्रेन में खाने में क्राक्रोच

मैंने अपनी पिछली पोस्ट 'मजबूरी का नाम है लालू' में रेलों में सर्व किए जाने वाले ठंडे वेस्वाद खाने की बात की थी. आज अखबार में पढ़ा कि अमृतसर शताब्दी में खाने पर क्राक्रोच रेंगते पाये गए. जिस यात्री के साथ ऐसा हुआ उसने वेटर से शिकायत की. वेटर ने बहस शुरू कर दी. इतने में कुछ और यात्रियों के खाने में भी क्राक्रोच मिले. अब वेटर बेचारा फंस गया. उसे यात्रियों से माफ़ी मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा. खाना बदल कर दूसरा दिया गया, पर उस में भी छोटे-छोटे कीड़े रेंगते पाये गए.

लालू जी की रेल का ट्रेड मार्क अब बदलना चाहिए - "ठंडा वेस्वाद कीड़े वाला खाना".

मजा यह रहा की केटरर की वकालत की गई. यह कहा गया कि केटरर द्बारा सप्लाई किए गए खाने में कीड़े नहीं थे. कीड़े ट्रे में थे. यात्री यह नहीं समझ पा रहे थे और सोच रहे थे कि ट्रे क्या वह अपने साथ लाये थे? अरे भाई ट्रे भी तो केटरर की ही थी. लेकिन बात सोचने की यह है कि रेल वाले केटरर की वकालत क्यों कर रहे थे? एक यात्री के अनुसार एक शताब्दी ट्रेन में केटरिंग का कांट्रेक्ट लेने के लिए एक करोड़ रिश्वत देनी पड़ती है. अब एक करोड़ खा कर रेल वालों को केटरर की वकालत तो करनी ही पड़ेगी.

लालू जी की रेल में यात्रा करने वालों से निवेदन है की वह सफर के दौरान खाने के लिए घर से खाना लायें. शताब्दी और राजधानी ट्रेन्स में यात्रियों से पूछा जाए ओर उन्हीं यात्रियों से खाने का पैसा लिया जाए जो लालू जी द्बारा सप्लाई किया खाना खाना चाहते हैं. जो यात्री अपना खाना घर से लायेंगे उनसे खाने का पैसा न लिया जाए.

Tuesday, July 08, 2008

मजबूरी का नाम है लालू

मैं अक्सर लालू जी की रेल में सफर करता हूँ. शताब्दी एक्सप्रेस में आपसे टिकट के साथ ही खाने का पैसा भी ले लिया जाता है. ऐसा सिर्फ़ लालू जी की रेल में होता है. आप किसी होटल या रेस्तौरेंट में जाइए, पहले आप अपनी पसंद के खाने का ऑर्डर देते हैं, खाना खाते है और फ़िर पेमेंट करते हैं. लालू जी की रेल में आपकी पसंद का कोई ख्याल नहीं किया जाता. कब सर्व होगा और कैसे सर्व होगा, यह सब लालू जी की मर्जी है. खाने में क्या सर्व होगा यह भी लालू जी तय करते हैं. अब आपको यह ही खाना खाना पड़ेगा. रेल से बाहर जा नहीं सकते. आप यह भी नहीं कह सकते कि भई में अपना खाना ख़ुद ले आऊंगा, आप मुझसे लालू जी के द्बारा सर्व किये खाने का पैसा मत लीजिये.

"ठंडा वेस्वाद खाना" लालू जी की रेल का ट्रेड मार्क है. यह खाना न देखने में अच्छा है और न खाने में. इसकी पेकिंग भी बहुत घटिया होती है. जिस तरह से यह आपको सर्व किया जाता है वह भी बहुत ही घटिया है. रेल के वेटर इस तरह सर्व करते हैं जैसे सोच रहे हों कि कहाँ फंस गए और किसी तरह यह काम ख़तम हो तो जान छूटे. मैंने बहुत से सहयात्रियों से इस बारे में बात की है. लगभग सभी का यह कहना है कि भूख लगी होती है और कुछ दूसरी चीज खाने को होती नहीं, इस लिए इस ठंडे वेस्वाद खाने को गले से उतार कर पेट भरते हैं. क्या करें मजबूरी है, और मजबूरी का नाम है, लालू.

बहुत से यात्री लालू जी का खाना नहीं खाते. बस आइसक्रीम से काम चलाते हैं. उन का कहना है, भले ही देर से खाएं घर का खाना ही खाएँगे. एक बार मैंने अपने सहयात्री से पूछा कि आप ने खाने को मना क्यों कर दिया, उन्होंने मुझे घूर कर देखा, फ़िर मेरी खाने की ट्रे को देखा, फ़िर मेरे ऊपर एक दया भरी द्रष्टि डालते हुए कहा, "बीमार पड़ना है क्या?". मैं बीमार तो नहीं पड़ा पर लालू जी का खाना खाने के बाद मन काफ़ी देर तक अजीब सा रहता है. एक बार ऐसा हुआ कि एक बच्चे को उलटी हो गई थी. उसने अपने पापा के बहुत मना करने पर भी लालू जी का दही खा लिया था.

कल ही मैंने यह ठंडा वेस्वाद खाना खाया था. मन अजीब सा हो गया था. घर पहुँचा तो पत्नी ने कहा घर से कुछ ले जाया करो, क्यों बीमार पड़ने पर तुले हुए हो? सोचता हूँ पत्नी की बात मान लूँ. इस ब्लाग के माध्यम से लालू जी से छमा चाहूँगा. लालू जी अब और आपका खाना नहीं खा पाऊँगा, भले ही आप उसके पैसे मेरी जेब से निकालते रहें.

Sunday, July 06, 2008

लालू जी की रेल - अघोषित घोषणाऐं

लालू जी अक्सर घोषणाऐं करते हैं, बजट के दौरान, हार पहनने के वाद, फीते काटने के वाद. इस के अलावा स्टेशन पर भी बहुत सी घोषणाऐं होती हैं. पर कुछ घोषणाऐं ऐसी हैं जो कभी नहीं होतीं. यह घोषणाऐं ऐसी हैं जिनसे रेल के असली हालत पता चलते हैं. अब लालू जी तो यह घोषणाऐं करने वाले हैं नहीं, तो मैंने सोचा कि में ही क्यों न यह घोषणाऐं कर डालूँ.

"अगर आप किसी जरूरी काम से यात्रा कर रहे है और समय की भी पाबंदी है तब हमारी रेल से यात्रा न करें. अगर कोई रेल समय से पहुँच जाती है तब यह ईश्वर की इच्छा है. समय का हमारी रेल में कोई महत्त्व नहीं है. हम देरी के लिए खेद प्रकट करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते."

"अगर आपको सादा, स्वच्छ, स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना खाने की आदत है तब अपना खाना ख़ुद लायें. यात्रा के दौरान अगर आपने स्टशन या रेल में आईआरसीटीसी द्बारा सप्लाई किया गया खाना खाया और बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपको सुबह घूमने की आदत है और स्वच्छ हवा अपने फेफड़ों में भरने का नशा है तब स्टेशन पर बने प्रतीक्षालयों में न जाएँ. बहाँ के अशुद्ध वातावरण में अगर आप बीमार हो गए तो इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"अगर आपकी रेल किसी स्टशन पर रुकी है तब खिड़की से बाहर न झांकें. साथ की पटरियों पर गन्दगी और कूड़ा-करकट देख कर अगर आपकी तबियत ख़राब हो गई तब इसके लिए आप ख़ुद जिम्मेदार होंगे."

"रेल का बहुत सा पैसा जुर्माने से बसूल होता है. इसलिए बिना टिकट या ग़लत टिकट के साथ यात्रा करें और जुर्माना भरें. ऐसा करके आप अपना राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा करेंगे रेल को फायदा होगा और हमारे मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"समय से टिकट खरीदना कोई अच्छी आदत नहीं है. तत्काल सेवा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें. इस से आपकी जेब हलकी होगी, रेल की जेब भरेगी, मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे."

"अगर आपको दिल्ली से आगरा जाना है और वापस आना है तब वापसी का टिकट दिल्ली में खरीदें. जाने का टिकट आगरा के किसी ट्रेवल एजेंट द्बारा खरीदें. इससे हर टिकट पर हमारी रेल को १५ रुपए ज्यादा मिलेंगे. रेल फायदे में जायेगी. मंत्री जी की तारीफ़ होगी और उन्हें हार पहनने को मिलेंगे. ऐसा सब यात्राओं में करके अपनी राष्ट्रभक्ति का सबूत दें."

"रेल सेवाओं में कमी और गड़बड़ की शिकायत करना अच्छी आदत नहीं है. यह बिना मतलब की शिकायतें करके आप मंत्री जी और उनके सहयोगिओं को परेशान करते हैं. हमारी रेल में शिकायत सुनने और उस पर कार्यवाही करने का कोई प्रावधान नहीं है. शिकायत करके अपना और हमारा समय नष्ट न करें."

"रेल सुरक्षा बल आपकी सुरक्षा के लिए नहीं है. यह आपसे रेल को कोई नुक्सान न पहुंचे यह देखने के लिए है. अगर कोई सुरक्षा कर्मचारी आपकी वजह से परेशान हुआ तो आपके ख़िलाफ़ कार्यवाही की जायेगी."

"हमारी रेल में आप अपनी जिम्मेदारी पर सफर करते हैं. समान की चोरी, आपकी अपनी टूट-फूट और किसी भी नुकसान के लिए आप ख़ुद जिम्मेदार हैं. आप अपनी मर्जी से रेल में यात्रा करते. हम आपको यात्रा करने के लिए बुलाने नहीं जाते."

"हम अक्सर ऐसा कहते हैं - 'रेल आपकी संपत्ति है'. इसे सच न मान लें. रेल हमारे मंत्री जी और उनके परिवार, सम्बन्धियों, मित्रों और अन्य राजनेताओं की व्यक्तिगत संपत्ति है. आप उस में इस लिए सफर करते हैं कि रेल को फायदा हो. आपकी सुविधा के लिए हम रेल नहीं चलाते."