एक ख़बर के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड ने चितरंजन पार्क के 'जी' ब्लाक में सड़क पर एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदा. गड्ढा इतना बड़ा है कि लोगों के घर के दरवाजे तक पहुँच रहा है. जितनी तेजी से उन्होंने यह गड्ढा खोदा उस से ज्यादा तेजी से वह गड्ढे को ऐसा ही छोड़कर भाग गए. अब बारिश का मौसम समाप्त होने तक यह गड्ढा ऐसा ही रहेगा.
जो हुआ उस में कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं. दिल्ली की सिविक एजेंसीज इस सब के लिए हमेशा से मशहूर हैं. सच पूछिए तो पूरी दिल्ली सरकार ही गड्ढे खोद रही है और खुदवा रही है. दिल्ली में कहीं भी चले जाइए आपको गड्ढे ही गड्ढे नजर आयेंगे (मनमोहन जी की हरी-भरी, साफ़-सुथरी और अति सुंदर दिल्ली को छोड़कर).
चितरंजन पार्क के निवासी हर समय खतरे में हैं. किसी भी समय कोई भी गड्ढे में गिर सकता है. गड्ढे के चारों तरफ़ कोई बाढ़ नहीं हैं, न कोई खतरे से आगाह करने का कोई बोर्ड है. खुले पानी के पाइप्स, विजली और फोन के तार, कोई भी कभी भी उलझ कर गिर सकता है. पर किसे चिंता है? मनमोहन, शीला और जल बोर्ड के चीफ और अधिकारिओं के घर के आस पास गड्ढे नहीं खोदे जाते. अगर कोई गिरेगा तो कोई आम आदमी गिरेगा और आम आदमी की चिंता किसे है?
क्या यह संब अपराध नहीं है? इन लोगों को सजा क्यों नहीं दी जाती? क्या कानून सरकार और सरकारी बाबुओं के लिए नहीं है? दिल्ली जलबोर्ड वालों, डूब मरो शर्म से इस गड्ढे में.