क्या आप ने कभी ऐसा ग्राहक देखा है जो कहता हो, 'शिकायत करना मेरा शौक है'? शिकायत करना और उसे उस के सही अंजाम तक ले जाना एक बहुत मुश्किल काम है, जिस में पैसा, समय और ऊर्जा सब बरबाद होते हैं. बहुत कम प्रतिशत है ऐसी शिकायतों का जिन के परिणाम से ग्राहक पूरी तरह संतुष्ट हो. अक्सर ग्राहक शिकायतों को बीच में ही छोड़ देते हैं. मेरा एक मित्र कहता है
कि अगर आप को किसी से दुश्मनी निकालनी हो तब उस से किसी उत्पाद-सेवा विक्रेता की शिकायत करवा दीजिये, और फिर उसे शिकायत के भंवर में छटपटाता हुआ देख कर खुश होते रहिये.
आप को ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो आप की परेशानी में तुरंत आप को यह सलाह दे देंगे कि शिकायत कर दो. यह वह लोग होते हैं जिन्होनें या तो कभी शिकायत की ही नहीं होती या जिन्होनें शिकायत तो की थी पर उस के बाद कभी शिकायत न करने की प्रतिज्ञा भी कर ली थी. भारत में शिकायतकर्ता को पसंद नहीं किया जाता. एक छोटे से उत्पाद-सेवा विक्रेता से ले कर प्रधानमंत्री कार्यालय या राष्ट्रपति सचिवालय तक सब शिकायतकर्ता को शिकायती नजरों से देखते हैं. उनका वश चले तो शिकायत करना एक अपराध घोषित कर दें.
ग्राहक जब सब तरफ से निराश हो जाता है तब शिकायत करता है. अगर उस की शिकायत को पहले स्तर पर ही निपटा दिया जाय तब उसे ग्राहक अदालतों तक जाने की जरूरत ही न पड़े. लेकिन असंतुष्ट ग्राहक की बात ही कोई सुनना नहीं चाहता. उस के हर तर्क को नकार दिया जाता है. जब वह अदालत में पहुँचता है तब उस के खिलाफ वकील खड़े कर दिए जाते हैं. असंतुष्ट ग्राहक को सौ रूपए का मुआवजा नहीं देंगे पर वकीलों को हजारों रूपए दे देंगे. मेरा मानना है कि उत्पाद-सेवा विक्रेता अपने नकारात्मक व्यवहार से ग्राहक को शिकायत करने के लिए मजबूर कर देते हैं.